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हमर एक छत्तीसगढ़ तुम्हर एक सौ छत्तीस गढ़

By   /   December 14, 2017  /   No Comments

 

सुरेन्द्र प्रबुद्ध अक्षरा, तोषगांव
मो – 9669274393
अगर इस आलेख की शुरूआत हमर छत्तीसगढ़ बनात तुम्हर सौ छत्तीसगढ़ से की जाती तो निश्चित ही वह उससे वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में उपजे भारत बनाम इंडिया जैसे राष्ट्रीय द्वंद का लघु संस्करण ही होता है। संस्करण कितना ही लघु या संक्षिप्त हो उसमें मूल रचना की अंर्तरात्मा क हीं अधिक गूढ़ नुकीली और पेचीदी होतीे, जिस पर चर्चा अति आवश्यक होती, भले ही मुख्य विचारधारा से टकराने और भटकाने के कितने ही प्रयास किए जाएं। भारत बनाम इंडिया अथवा हमर छत्तीसगढ़ बनाम तुम्हर छत्तीसगढ़ जैसा अनिवार्य विषय मुख्य चिंताधारा बन जाएगा ही और केन्द्र में आकर ही रहेगा इसे तमाम कोशियों के बावजूद नकारा नही जा सकता भले ही टाला जाता रहेगा जैसा कि आजकल हो रहा है। पिछले अंक में चम्पारण किसान आंदोलन का सांकेतिक विवरण देते हुए यह रेखांकित किया गया था कि किन कारणों से चम्पारण में आत्मोत्सर्ग करने वाले केवल एक शताब्दी में मराठावाड़ा में सर्वाधिक संख्या में आत्महत्या जैसे कुकृत्य की ओर प्रवृत हो गए। जहां शेतकारी खेतिहर संगठन ने किसान हित में जन आंदोलन खड़ा किया था और उसी आंदोलन के गर्भ से भारत बनाम इंडिया जैसा विचार विमर्श मुखर हुआ था वहीं क्रमश: निश्तेज व निष्फल होता गया। किसानों की आत्महत्या की दर अन्य भागों संक्रमित हुई जो चिन्ताजनक रूप ये बढ़ी और आज दुसाध्य अवस्था में मध्य भारत में फैल गई जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। माना कि स्वाधीन देश के साम्प्रतिक आधुनिकीकरण के दौर में कृषि बनाम उद्योग का तीव्र द्वंद पुर्नबार उभरा है। यह द्वंद सांस्कृतिक द्वंद को भी समेट लिया है तो व्यापक होकर भारत बनाम इंडिया में प्रासंगिक होता गया। यह उस वैश्विक विमर्श का फैशनबल हिस्सा भर नही है जिसे कई विचारकों ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की मीमांसा को दो बेमल संस्कृतियों का मुठभेड़ बताकर ईसाई बनाम इस्लाम की दीर्घकालीन लड़ाई में बदलने की चेष्टा की है। यह भी माना कि विश्व के अधिकांश देशों में उद्योगतंत्र ने स्थानीय आजीविका स्रोतों(विशेषकर कृषि) जानलेवा हमला कर रखा है और प्रतिफलन संकेत देते है कि कृषि संकुचन और सिकुडऩ को आत्मरक्षा बना रही है जो हताशा और पराज्य के लक्षण है अर्थात कृषि संस्कृति(एग्रीकल्चर) कमजोर होती जा रही है एवं औद्योगिक सभ्यता विजयी उन्माद में गरज रही है। क्या यह भ्रामक तथ्य भारत में भी सर्वमान्य वास्तविक सच है ? क्या वर्तमान भारत की पतनोन्मुख दुर्दशा का कारण केवल कृषि ही है और मुक्ति उद्योग से संभव है जैसा कि इंडिया का तर्क है ? क्या किसान अपनी निरर्थकता और हार को अंतत: स्वीकार करने के लिए विवश है या कि विवश किया जा रहा है ? क्या सचमुच किसान सामूहिक रूप से इतना आत्महीन व नेतृत्वहीन हो गया है कि भारत का भाग्य विधाता नही रहा? इन्ही प्रश्न, संदेह और व्याकुल अनिश्चितताओं के बीच छत्तीसगढ़ की चर्चा समीचीन हो जाती है। भारत बनाम इंडिया के दीर्घफलक की बहस के बीच छत्तीसगढ़ पर चर्चा आवश्यक है। विषयवस्तु की गहनता व गुणवत्ता पर क्षेत्रफल का कोई असर नही पड़ता। यद्यपि भौगोलिक व राजनैतिक आधार पर छत्तीसगढ़ एक स्वायत राज्य ईकाई जरूर है लेकिन देश के भीतरी भाग के किसी भी क्षेत्र में कृषि विरूद्ध उद्योग का जबर्दस्त अंतद्र्वंद दिन ब दिन महासमर या उग्र रूप लेता दिखाई देने लगा है और स्वतंत्र देश का लोकहितैषी शासन लोकतंत्रीय आवरण में संविधान की शपथ लेकर भी निष्पक्ष न्यायधीश या निर्णायक की भूमिका में नही है लेकिन विडम्बना देखिए कि खुल्लमखुल्ला शर्मिंदगी की सारी हदें लांघकर उद्योग का पक्षधर बन गया है वरन नियामक संरक्षक और पोषक हो गया है। छत्तीसगढ़ इस षडय़ंत्र का शिकार है इसलिए भारतीय कृषि सभ्यता कितनी ही प्राचीन परंपरागत और गहरी होकर बहुसंख्यक प्राणी जगत का जीवनधार हो तथापि उसकी नियति शोषित दमित क्षरित और उपेक्षित होने रहने की है, यद्यपि कभी कभार शासन सत्ता की ओर से टेक भर मिल जाती है (यादें दी जाती है) जो बहुसंख्यक किसानों के मताधिकार का संतुष्टिकरण मात्र है। कृषि विकास की समग्र नीति नही है। स्पष्टत: सरकार नामक सत्ता संस्थान में किसान कही हैं ही नही, अगर है भी तो दोयम नागरिक या शरणार्थी के रूप में है। इसी दृष्टि से छत्तीसगढ़ पर सोचा जाय तो किसान व आदिवासी दो मूल निवासियों की समान अधो गति रही है। जब कोई शासन सत्ता अपने राज्य की अधिकांश पूंजी, बौद्धिकता और बल को उद्योग के पक्ष तथा कृषि के विपक्ष में झोंक दे तो किसान और आदिवासी वर्ग की व्यक्ति ईकाईयों को मुख्यधारा प्रवाह में खड़ा रह पाना बहुत दुष्कर कार्य हो जाता है। ऐसी भयावह के संकेत आधुनिक परिस्थितियों में से उभर रहे हैं जिसे जन चेतना समझने लग गई है। सकारात्मक पक्ष यही है कि छत्तीसगढ़ के भूमि प्राकृतिक वरदानों से अटी पड़ी है(यह बात पूरी भारतभूमि पर भी लागू होती है) विगत इन्ही पृष्ठों में वन्दे मातरम जैसे राष्ट्रगीत में वर्णित प्राकृतिक सौंदर्य पर लिखा गया था कि कवि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने मानो छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक छटा को ही शब्द दे दिया था। कवि ने वन्दे मातरम गीत को मातृ वंदना के रूप में लिखा था जिसमें धरा का माता में मानवीयकरण किया था जिसकी भावभूमि व पृष्ठभूमि में बंगाल की अकूत व अप्रतिम प्रकृतिश्री थी लेकिन क्या यह कालजीवी संस्कृत कविता छत्तीसगढ़ की प्रकृति की शोभा का चित्रण आवश्यक नही है क्योंकि यहां के रचनाकारों ने इस पर खूब कलम चलाई है और आजकल छत्तीसगढ़ी रचनाकारों ने मुहिम चलाया है। इन्हे राजधानी से प्रकाशित सभी अखबारों ने एक पूरा पृष्ठ साप्ताहिक परिशिष्ट के रूप में मंच दिया गया है जो छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए समर्पित है। इस तरह छत्तीसगढ़ के बारे में छत्तीसगढ़ी में प्रशंसनीय रचना कर्म जारी है। यहां यह कहना जरूरी है कि प्राय: सब कुछ हमर छत्तीसगढ़ के बारे में लिखा पढ़ा सुना कहा जा रहा है। यहां हमर छत्तीसगढ़ है यह वह छत्तीसगढ़ नही है जिसके बारे में सरकारें नारा लगाती हैं योजनाओं का दिखावा करती है, सपनों की आकाशगंगा दिखाती हैं। हमर छत्तीसगढ़ वह भी नही है जो चुनाव अभियानों , भाषणों, वक्तव्यों, विधानसभाओं, विकास परिषदों, अकादमिक सेमिनारों, साहित्यिक संगोष्ठियों और बहसों में गूंजता है। हमर छत्तीसगढ़ वह भी नही है जिसके चारों ओर विकास का व्यूह बनाया जाता है, सडक़ रेल व वायुयान के मार्गों का सजाल बिछाया जाता है। उद्योगों की भव्य गगनचुंबी इमारतें तानी जाती है और साथ ही साथ उनके विषय में यशोगान, जयघोष, उदघोष और भजनों का अटूट सिलसिला चलाया जाता है जहां हमर छत्तीसगढ़ उसी तरह ओझल है जैसे इंडिया की चकाचौंध में भारत की पहचान या अस्मिता व मौलिकता गुम हो रही है। हमर एक छत्तीसगढ़ को घेरकर तुम्हर एक सौ छत्तीसगढ़ खड़े किए जा रहे हैं। तो क्या हमर छत्तीसगढ़ एक अभौतिक काल्पनिक मिथकीय यूटोपिया है? नही यह ठोस व कटु सत्य है। बस आपको इस पर सोचना है। नई दृष्टि, नई सोच से नए कोण से सोचना भी है कि हमर छत्तीसगढ़ के चारों ओर कौन से 136 गढ़ या अधिक बनाए गए हैं ? ये नए कौन कौन से गढ़ हैं उनकी क्या रूपरेखा अवस्थिति और कारगुजारियां हैं ? बात अब हमर छत्तीसगढ़ के हम पर आ जाती है हां इसमें कोई शक नही कि सोचने समझने वाला प्राणी के रूप में हमें ही सोचना पड़ेगा और भारत (या छत्तीसगढ़) की भौगोलिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक ईकाई के चैतन्य वृत में रहकर सोचना पड़ेगा और तब प्रतिक्रिया बाहर आएगी। यों तो मानवीय गति के सिद्धांत में अबाधित निरंतरता मिलती है जो चिरंतन भी है।

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  • Published: 12 months ago on December 14, 2017
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  • Last Modified: December 14, 2017 @ 6:10 pm
  • Filed Under: Editorial

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