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संत कबीर जयंती विशेष, कबीर- एक अलौकिक समाज सुधारक एवं महान संत

By   /   July 2, 2018  /   No Comments

ज्येष्ठ पूर्णिमा को भारतीय हिन्दी साहित्य के महानतम शिल्पी को उनका जन्म दिवस मनाया गया। संत कबीर भक्तिकाल के निर्गुण ज्ञानाश्रयी के महान कवि ही नहीं थे एक अन्यतम संत भी थे। उनके जन्म दिवस पर उनके अमृतवाणी का पठन एवं गायन हुआ। कबीर नाम है उस पवित्रता एवं सत्यता का जिसकी शरण सीमा में आने वाले हर मानस साधु हो जाता है। कबीर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों ही महान हैं। संत कबीर आपसी मतभेदों, जाति धर्म का खण्डन कर मानव धर्म को ही पुष्ट करते हैं। अज्ञान एवं भ्रम को ज्ञानालोक से समाप्त करने का संदेश देते हैं। मुमुक्षु जनों के कल्याणार्थ ही कबीर का प्राकट्य हुआ। जीवन रूपी चादर को उन्होने विवेक, वैराग्य रूपी यत्न द्वारा मलिन होने नहीं दिया। उनके अनमोल साखियों ने आडम्बर, खोखले जीवन से मुक्त एक ईश्वर को प्रतिपादित ही नहीं किया मानव को मानवता का आचरण करने की अपार शिक्षा प्रस्तुत किया। आइए आज के प्रासंगिक कबीर की साखियों के कुछ अनमोल साखियों की चर्चा करें। जीवन में सद्गुरू के योगदान को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना है, वे लिखते हैं।
दंडवत् गोविन्द गुरू, वन्दौ अब जन सोय।
पहिले भये प्रनाम तिन, नमो जु आगे होय।।
सद्गुरू के चरणों में विनम्र भाव से प्रणाम है। अब से पूर्व वर्तमान एवं जो आगे भी होंगे ऐसे सद्गुरूओंं को भक्तिपूर्ण नमन है। गुरू तो केवल गुरू होते हैं वे हर काल में वंदनीय एवं पूजनीय हैं, परन्तु हर काल में छली गुरूओं को जाल से बचना भी आवश्यक है। सद्गुरू की पहचान पर-
बहुत गुरू भैं जगत में, कोई न लागे तीर।
सबै गुरू बहि जाऐंगे, जाग्रत गुरू कबीर।।
इस संसार में वेशधारी गुरूओं की कमी नहीं है वे सब भवसागर से पार लगाने वाले नहीं हैं। कबीर ने उस समय से यह सचेत कर दिया था कि छद्रमवेशी गुरू और सद्गुरू में क्या अंतर है, आज के तथाकथित चैनलों में दिखने वाले आडम्बरी गुरूओं से सावधान रहना होगा।
गुरूवा तो घर-घर फिरै, दीक्षा हमारी लेहु।
कै बुड़ौ कै उबरौ, टका पर्दनी देहु।।
अपने आप को गुरू बताने वाले छद्रमवेशी गुरू घर-घर जाकर (चैनलों एवं शिविरों के माध्यम) दीक्षा ले लो का राग अलापते हैं, उनकी दीक्षा के बाद शिष्य डुबे या उबरे उन्हें तो बस रूपये और दक्षिणा से ही मतलब रहता है। परन्तु आज भी कुछ सद्गुरू हैं जो आपके जीवन में परिवर्तन लाने में सक्षम हैं, ऐसे में शिष्य को भी श्रद्धा एवं सम्मान भाव से गुरूवाणी को ग्रहण करना चाहिए।
वे लिखते हैं –
गुरू बेचारा क्या करै, हिरदा भया कठोर।
नौ नेजा पानी चढ़ा, पथर न भीजी कोर।।
जिस शिष्य का ह्दय कठोर है उसे ज्ञान की कोमलता नहीं, भीगा सकती जैसे पत्थर के ऊपर बहता हुआ पानी उसके एक कोर (किनारे) तक को नहीं भीगा सकता। ये तो रहे आजकल के टीवी और कमाई के साधन से परिपूर्ण तथाकथित गुरूओं की बातें आईए अब आज के सबसे बड़े दुव्र्यसनों पर कबीर की साखियों को देखें।
मांस भखै मदिरा पिवै, धन बेस्वासों खाम।।
जुआ खेलि चोरी करै, अन्त समुला जाय।।
मांसभक्षण, मदिरा पान, जुआ, व्यभिचार, चोरी आदि से सतर्क रहना चाहिए वर्ना समुल विनाश निश्चित है। आज यही सब घोर आचरण में दिखाई दे रहा है इसी कारण मानव पशुता का आचरण बढ़ रहा है। नशापान से व्यक्ति युवा, किशोर सभी डुबे हुए हैं। आज की भौतिकतावादी दुनिया में सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव विभिन्न मादक पदार्थों का है, उनकी यह साखी कितनी प्रासंगिक है देखिए-
भांग तमाखू, छतरा, जन कबीर जो खांहि।
योग यज्ञ जप तप किये, सबै रसातल जांहि।।
विभिन्न मादक पदार्थों के सेवन से व्यक्ति का योग,यज्ञ, तपस्या जप आदि से प्राप्त पुण्य सुख आदि रसातल में चले जाते हैं। आज की युवा पीढ़ी, गुटखा, सिगरेट, अफीम, शराब न जाने कितने प्रकार की मादक पदार्थों को उपयोग कर जीवन से दिग्भ्रमित हैं।
इन सब अमृत साखियों से भी एक से बढक़र एक साखी है जो अद्वितीय है, यह कहना कठिन होगा कि किस साखी को उत्धृत करें। एक-एक साखी की समीक्षा-व्याख्या में सारा जीवन लग जाएगा। इनकी समस्त साखियां जीवन के अनुभवों से परिपूर्ण हैं, सर्वप्रिय है, सरल है, निष्पक्ष है। इस प्रकार उनके महान व्यक्तित्व से कुछ मोती भी जीवन में आचरित कर लें तो संतत्व का आभाष अवश्य हो सकता है।
आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरू मान।
हरष शोक निंदा तजै, कहैं कबीर संत जान।।
यही उनके जीवन को अलौकिकता से परिपूर्ण करता है। अंत में आत्मा और परमात्मा के एकाकार, साक्षात्कार आनंदमय स्वरूप की यह साखी-
लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।
इस प्रकार संत कबीर के जीवनवृत को बताना सूरज को दीया दिखाने जैसा है। फिर भी कुछ अंश के द्वारा ही सही यही कबीर जयंती पर सच्ची श्रद्धा एवं भक्ति होगी।
अजय कुमार प्रधान
व्याख्याता पंचायत, लमकेनी (सराईपाली)

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  • Published: 3 weeks ago on July 2, 2018
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  • Last Modified: July 2, 2018 @ 9:36 am
  • Filed Under: Editorial

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