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शिक्षा

By   /   July 11, 2018  /   No Comments

शिक्षा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं, हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसमें निर्देश देते हैं मगर सिस्टम है कि सुधरने का नाम नही ले रहा है। असल में शिक्षा को लेकर दिल्ली सरकार को छोडक़र कहीं भी गंभीरता नही दिखती। लंबे समय के जद्दोजहद के बाद शिक्षाकर्मियों को अब उनका अधिकार मिल रहा है, अब उन्हे शिक्षा के विकास के लिए पुरजोर प्रयास करना चाहिए। शासकीय शिक्षा संस्थानों की खराब स्थिति के कारण धीरे-धीरे निजी स्कूलों की पकड़ बढ़ रही है, शिक्षा सिस्टम में जुड़े अधिकारी भी निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि थोड़ी सी भी विसंगती उन्हे मोटी कमाई का अवसर देती है। हमारा सिस्टम भी ऐसा हो गया कि शिकायत कर्ता को न्याय नही मिलता अधिकारी अपना हित साधकर आगे बढ़ जाते हैं। इसलिए धीरे-धीरे शिकायत कर्ता हतोत्साहित होते जा रहे हैं।
शिक्षा सिस्टम को अगर सुधारना है तो शासकीय कर्मचारी, पंचायत और अद्र्धशासकीय कर्मचारियों के साथ जितने जनप्रतिनिधि हैं उनके बच्चों को निजी स्कूलोंं में पढऩे पर रोक लगाई जाए, ऐसा प्रयोग भूटान में किया जा चुका है। आजादी के समय से लेकर पिछले दो दशक पहले तक भूटान में भारत की पुस्तकें चलती थीं और कुछ शिक्षक यहां से जाकर वहां पढ़ाई करते थे और वहां के शिक्षक आकर प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। दो दशक पहले भूटान के युवराज को जन्मकाल से वहां के शासकीय स्कूलों में दाखिला करवाया गया, जब युवराज स्कूल गया तो मंत्री के और अधिकारियों के भी बच्चे शासकीय स्कूलों में पढऩे जाने लगे, इसका असर यह हुआ कि वहां की अव्यवस्था मंत्रियों, अधिकारियों और राजा तक पहुंचने लगी। जब उनके बच्चे पढ़ रहे थे तो व्यवस्था सुधार पर उनका ध्यान भी गया, आज भूटान शासकीय स्कूलों की स्थिति 20 साल में इतनी बेहतर हो गई कि वहां आदर्श शिक्षा मिल रही है। निजी स्कूलों के मुकाबले शासकीय स्कूलों में अच्छा प्रवेश मिल रहा है। रायपुर के एक युवा तुर्क रहे पूर्व छात्र नेता ने एक बड़े अधिवक्ता के माध्यम से छग की शिक्षण संस्थानों के बदहाली और सिस्टम द्वारा मनमानी दिये जा रहे मान्यता पर सवाल उठाते हुए जनहित याचिका दायर की है मगर शिक्षा विभाग का सिस्टम कागजों में इस तरह प्रस्तुत करता है कि लगता है स्कूलें बेहतर ढंग से चल रही हैं। जबकि धरातल पर स्थिति बिलकुल विपरित है। अब तो लोग यह बोलने लगे हैं कि चार कमरे किराये में लो और स्कूल खोल लो। लोग स्कूल को दुकान की भी संज्ञा देने लगे हैं। जो हमारे सिस्टम के लिए और देश के लिए चिंता का विषय है। किसी स्कूल में जमीन की समस्या है तो किसी में शिक्षकों की, कहीं बुनियादी इंफ्रा स्ट्रक्चर ही नही हैं। सबसे बड़ी बात पालकों की सुनवाई कहीं भी नही है,जो सुनवाई करने वाला है उनके अपने ही सद जाते हैं। जनहित में कुछ लोगों ने आपसी चर्चा में मंत्रियों, नेताओं और कलेक्टर तक यह बात भी पहुंचाई लेकिन कहीं कुछ खराब सिस्टम को रोकने हेतु कार्यवाही नही हुई। बुनियादी तौर पर ईमानदारी से स्कूल चलाने के लिए जो सिस्टम चाहिए चाहे वह शासकीय स्कूल हो या निजी सभी को बच्चों के लिए जो बुनियादी सुविधा है, उसके लिए दृढता से प्रयास करना चाहिए। छग के शिक्षा विभाग की बनिस्पत केन्द्रीय शिक्षा तंत्र की मान्यता प्रक्रिया बेहतर है, वे भूमि के समस्त दस्तावेज, पीने योग्य जल का प्रमाणीकरण और योग्य प्रशिक्षित शिक्षकों का साक्षात्कार के साथ इंफा स्ट्रक्चर को पेपरों में देखने के साथ-साथ उसकी वीडियो सुटिंग भी कराते हैं। अगर शासन मान्यता दी जा रही स्कूल के लोकेशन के साथ वीडियोग्राफी भी करवाये तो बहुत कुछ भ्रष्ट तंत्र को रोका जा सकेगा। कहने के लिए कहा जाता है साफ नियत सही विकास मगर हमारा भविष्य ही स्कूलों में बदहाली को झेल रहा है उनकी समस्या सुलझाने के लिए कोई तंत्र नही है, जब तक आम पालक और आदमी की सुनवाई नही होगी तब तक तंत्र उस पर हावी रहेगा और मनमानी चलती रहेगी।

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  • Published: 4 months ago on July 11, 2018
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  • Last Modified: July 11, 2018 @ 10:00 am
  • Filed Under: Editorial

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