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रेल

By   /   June 6, 2018  /   No Comments

छुक छुक करती आती रेल,
छुक छुक करती जाती रेल ।
चिंटू पिंटू मोनू सोनू,
दौड़ लगाये खेले खेल ।
पटरी पर है चलती रेल,
यात्रियों को भरती रेल ।
इस शहर से उस शहर तक,
सबको भर ले जाती रेल ।
सौ सौ डिब्बों वाली रेल ,
कभी ना रहती खाली रेल ।
दौड़ लगाती खूब तेजी से,
जल्दी से पहुँचाती रेल ।
साफ सुथरा अब रहती रेल,
पंखा एसी चलती रेल ।
कचरा फेंके जो डिब्बे में,
उसको तो पहुँचाती जेल ।
चुन्नू मुन्नू चढ़े रेल,
दिनभर खेले अपना खेल ।
यात्रियों का पेलम पेल,
एक दूजे से होये मेल ।
प्रिया देवांगन (प्रियू)
पंडरिया, कबीरधाम छत्तीसगढ़

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  • Published: 5 months ago on June 6, 2018
  • By:
  • Last Modified: June 6, 2018 @ 10:16 am
  • Filed Under: Poetry

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