Loading...
You are here:  Home  >  Editorial  >  Current Article

मूर्तियों का मंडन खंडन

By   /   May 19, 2018  /   No Comments

अर्वाचीन समय में भारत कितना बड़ा प्रभुत्वशाली धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र क्यों न घोषित हो, उसकी नींव में लोकतंत्र जैसा सिद्धांत विरल है और परंपरागत आस्तिकता की भावना अधिक सघन है. आस्तिकता की भावना मन में निहित भक्ति का विस्तार है जिसका एक अनुबंग भाव श्रद्धा है. इस तरह देश श्रद्धालु जनता से बना है. भक्ति व श्रद्धा की अजस्र धारा प्राचीन समय से प्रवाहित हाती आ रही है. वैसे भक्ति ईश्वर-केंद्रीत धार्मिकता है. इसी परिपे्रक्ष्य में ईश्वर के आकार (रूपाकार) की बात आती है और ईश्वर की पूजा क्रमश: मूर्तिपूजा में बदलती आयी है. यद्दपि युग के अनुसार धार्मिक रीति रिवाजों और कर्मकाण्डों ने रूपायन का शिल्प व शैली बदला है. पुरात्वातिक निर्मितियों में अंकित मूर्तियों में इस विकास क्रम को देखा जाता है. स्पष्ट है कि मिट्टी रेत पत्थर धातु काठ कपड़ा दीवार चट्टान और रैखिक संयोजन आदि कई साधनों के माध्यम से आकार उभारे गये हैं। चित्र उकेरे गये हैं और मूर्तियों निर्मित की गई है तथा उन्हें यथाशक्य संग्रहीत भी किया गया है। आकार को लेकर भक्ति आंदोलन में गंभीर बहस छिड़ी थी। साकार और निराकार के मध्य का वैचारिक संघर्ष युगान्ताकारी घटना है। सगुण व निर्गुण की मीमांसा कम द्वन्दात्मक नहीं थी. लेकिन बहस का बहुमत सदा साकार व सगुण के पक्ष में रहा है। इसी आकार भाव ने मूर्तन कला को उत्प्रेरित किया था जिसके फलस्वरूप असंख्य मूर्तियां बनीं बिगड़ी ढही और मरी हैं। आधुनिक काल के चित्रकार राजा रवि वर्मा ने अमूर्त देवी देवताओं का मानवीकरण कर चित्रकला की बड़ी श्रंृखला का अंकन किया था जो आज भी पे्रस के सहयोग से वार्षिक कलेण्डरों के रूप में भित्ति चित्र बनकर घर-घर की शोभा बढ़ाते हैं। इतिहास में जहां मानव ने अपनी आपाद मस्तक अथवा आवक्ष मूर्तियां बड़ी संख्या में बनायी है जो आज भी निरंतर जारी है जिसके साथ अपने मित्र जीव जंतुओं को सहचर सहयात्री और अभिन्न साथी के रूप में स्थान दिया है। सांची के स्तूप में सिंह बैल और घोड़ा है। कई देवी देवताओं के वाहन के रूप में पशु पक्षी जैसे सिंह बाघ भालू बैल घोड़ा हाथी मगर बंदर मूषक गरूड़ उल्लू हंस आदि चित्रित और निर्मित हैं। गाय कामधेनु के रूप में पूजित व बहुव्यापी है। मूर्ति का सर्वप्रिय माध्यम शिलाखंड हैं, विशेषकर रजतवर्णों संगमरमर अतिशय लोकप्रिय माध्यम है। मध्यकाल में हिन्दू कुश पर्वतमाला (अफगानीस्तान) में भगवान बुद्ध की 200 फुट ऊंची कई प्रस्तर मूर्तियां मानवाकार उत्तीर्ण की गई थी जिनकी भावमुद्राएं भिन्न-भिन्न थीं उन्हे लादेन के आदेश पर तालिबानी गुर्गों ने तोप से उड़ा दिया था जिस घटना को विश्व की ममन्तिक त्रासदी मानी गयी थी। वैसे ईश्वर के मूर्तन के बाद उसे मंदिरों में सुशोभित कर विराजा जाने लगा। वास्तव में मंदिर मूर्तिकला के अद्भूत संग्रहालय ही है जहां मूर्तिपूजा समस्त कर्मकाण्डों सहित संपन्न होती है। अब तो मूर्तियां घर-घर में स्थापित व पूजित होती है। घर के आंगन से लेकर हिमालय के उत्तुंग शिखरों की कंदराओं में मूर्तियां विराजित है। विष्णु की मूर्तियां मानवाकार, शिव की लिंगाकार तथा शक्ति की कहीं अर्ध मानवाकार कहीं पूर्ण मानवाकार होती है। भारत में लगभग चार लाख सक्रिय मंदिर हैं, इससे कई गुणा अधिक खंडहर हैं अथवा भूमिसात हैं जहां असंख्य मूर्तियां खंडित अवस्था में विलीन हो गयी हैं। हिन्दू जैन बौद्ध सिक्ख आदि कई धर्मों में मूर्तिपूजा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में विद्यमान हैं। आदिवासी समाज मूर्तिपूजा में विश्वास करता है जो सजीव वृक्षों, शिला खंडों और काष्ठ वस्तुओं में मूर्तिमंत होते हैं। मूर्तिपूजा की सुदीर्घ परंपराओं के अवलोकन व अध्ययन से ज्ञात होता है कि मनुष्य हर काल में कई दृष्टिकोणों से मूर्ति से संबंद्ध रहता आया है जो अधुनातन काल में भी युगसापेक्ष संशोधनों के साथ जारी है। आजकल राजनीति ने राजनीतिक क्षेत्र में मूर्ति ेका सर्वाधिक सदुपयोग नहीं दुरूपयोग किया है। इसका कारण भारतीय जन का अधिसंख्यक भाग का मूर्तिपूजक होना है जिसका वोट बैंक के लिए सर्वाधिक दोहन होता है। यात्रा पे्रमी भारतीय तीर्थ यात्रा को जीवन का एक अभीष्ट लक्ष्य मानता है तथा समुद्र के तट से लेकर पर्वतमालाएं नापते हुए गंगा की लहरों में स्नान करता है और आगे चढक़र हिमालय के कैलाश शिखर में स्थित केदारनाथ, बद्रीनाथ, मानसरोवर तक पर्यटन करता है और प्रकृति दर्शन, नौकाविहार, पर्वतारोहण आदि का शौक पुण्य लाभ कमाकर पूरा करता है. तीर्थ यात्रा में मूर्ति दर्शन का तीव्र आकर्षण होता है। सारांशत भारतीय जन साधारण बड़े पे्रम से मूर्तियों का आजीवन मंडन करता है। मूर्तियों के मंडन के पीछे जितनी लंबी परंपराएं हैं उतनी ही लंबी इसके ठीक विपरीत खंडन की हिंसात्मक कथाएं हैं जो त्रासद एवं उपद्रवकारी हैं। मंडन खंडन के दो पहलू हैं जो इतिहास में धार्मिक सांस्कृतिक एवं सामाजिक ऊथल-पुथल (क्रांति-उत्क्रांति) का द्योतन व प्रतिनिधित्व करते हैं। यह अभी भी देखी जाती है। आजकल मंडन खंडन में समानुपात तो है हीन ही, सकारात्मक पक्ष एकदम धूमिल व निराशा जनक है तो उसके बनिस्पत नकारात्मक पक्ष एकदम चौंधियाने वाला व खतरनाक है। ऐसा क्यों? हो मूर्ति मंडन के पीछे व्यक्ति या समूह के सकारात्मक मूल्यबोध मिलते हैं लेकिन जब उसमें नकारात्मक दृष्टि व युक्ति मिला दी जाती है तो देर सबेर विवाद उत्पन्न होना अवश्यम्भावी हो जाता है क्योंकि पूरा जनमानस नकारात्मक सांस्कृतिक परिवेश में जी रहा है और पतनोन्मुख ही है इसलिए कोई भी मूर्ति निर्विवाद नहीं रह पाती। मूर्ति स्वयं विवाद की निमित्त बन जाती है क्योंकि समाज अनेकानेक स्तरों पर खंडित है, जातियों में विघटित है और जातियों के बीच परस्पर पे्रम सौहद्र्रि की गुंजाइश नहीं रहती तब स्वयमेव घृणा द्वेष प्रतिहिंसा और वैरभाव पैठ जाते हैं। फलत: किसी भी बहाने विवाद होता है जो देखते ही देखते हिंसक हो जाता है। राष्ट्रीय चरित्र इतना खोखला है कि कोई भी सहमति शत प्रतिशत नहीं बन पाती और विरोध प्रखर हो जाता है। देश के दक्षिणी सीमांत पर स्थित कन्याकुमारी अंतरीप में दो संतों की मूर्तियां स्थापित है जो सर्वमान्य व निर्विरोध नहीं रह पाती यद्यपि वे महान संत राष्ट्रबोध के ज्वलंत प्रतीक है। रामकृष्ण हिन्दूओं में बुद्ध बौद्धों में, महावीर जैनियों में ही क्यों सीमित कर दिये जाते हैं? महात्मा गांधी को गुजराती कायस्थ के घेरे में क्यों जकड़ा जाता है? कांशीराम जैसे दलित उद्धारक को एक पार्टी के दायरे में क्यों बांध दिया जाता है जिनकी विशाल प्रतिमाएं (हाथी की प्रतिमाएं भी) स्थापित कर क्यों राजनीति साधी जाती है? स्व. महापुरूषों को राजनीति का मोहरा क्यों बनाया जाता है? कितना दुखद व चिंतनीय है कि जातिवादी संकीर्ण राजनीति लोकतांत्रिक खुलेपन में ऐतिहासिक महानायकों को भी बौना पक्षपाती और अनुदान बना देती है। डॉ. सम्पूर्णानंद जैसे समाजवादी विचारक को बाबू जगजीवन राम के द्वारा माल्यार्पण कर देने से मूर्ति कैसे अपवित्र हो गई जिसे गंगाजल से कथित शुद्धिकरण किया गया? क्या रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि महापुरूष महज बंगाली रह गये हैं? क्या महर्षि दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी केवल गुजराती हैं? डॉ अम्बेडकर का विराट वैचारिक व्यक्तित्व इसलिए नीच हो जाता है कि वे कथित अपृश्य महार जाति में पैदा हुए थे? क्या भगतसिंह पंजाबियों के लिए क्रांतिकारी हैं? क्या वीर नारायण सिंह बरिहा आदिवासियों के ही नेता हैं? ऐसे दुश्चकोंं और षडयंत्रों का अभेद्य जाल पूरी जन चेतना में छाया है जो संकीर्ण जातिवाद की ही कूट रचना है। एक सद्य राजनैतिक घटनाक्रम की ओर ध्यान जाता है। आग्नेय भारत के चुनाव में भाजपा की त्रिपुरा में जीत ऐतिहासिक और अविश्वासनीय है लेकिन जीत जीत है और सत्य है. श्रेय को भाजपा को जाता है जिस हेतु विजयोल्लास स्वाभाविक है क्योंकि वहां दो दशकों से अधिक समय तक लगातार पदस्थ माक्र्सवादी शासन को पराजित किया गया। लेकिन तदुपरांत लेनिन की प्रतिमा के विखंडन का क्या औचित्व है उससे भी बुरी दुखद बात यह कि उसकी प्रतिक्रिया में भारतीय जनसंघ (जो देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है) के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को महानगर कलकत्ता में क्षतिग्रस्त करना है। क्या जीत का उत्सव और हार का स्वीकार्य मानने का यही शिष्टाचार है? यह किस संस्कृति के संकेत और प्रमाण हैं? इस प्रकार के दुश्चक देश के कोने-कोने में देखा जाता है।
छत्तीसगढ़ भी अपवाद नहीं है जो रायपुर से सराईपाली बसना तक फैला हुआ है। एक मूर्ति का मंडन एक पक्ष का ओज बढ़ता है तो प्रतिपक्ष में घृणा क्यों? एक मूर्ति का खंडन एक पक्ष का शौर्य बढ़ाता है तो दूसरे पक्ष में हिंसात्मक आवेश क्यों? क्या यह संतुलन समरस व समभाव का घातक विलोम नहीं है? सारांश यह कि समाज महापुरूषों को सम्मान देने का सलीका नहीं जानता। हमें मूर्ति स्थापना के सही स्थान तक का ज्ञान नहीं है वास्तव में मूर्ति को आगे रखकर जातिगत शक्ति प्रदर्शन किया जा रहा है जो और आगे बढक़र गृह युद्ध जैसे संघर्ष में बदल जाने का खतरा पैदा करता है। अभी जो घटित हो रहा है वह विस्फोट के पूर्व की स्थिति है। मूर्ति निमित्त मात्र है जिसकी छाया में चिनगारी सुलग रही है। क्या कारण है कि रायपुर में महात्मा की मूर्ति का कभी चश्मा कभी घड़ी कभी लाठी तोड़ा जाता है भगतसिंह के सिर पर ह्ेट और पगड़ी का विवाद गहरा जाता है। सराईपाली में डॉ अम्बेडकर की मूर्ति को शहर से बाहर उस स्थान पर स्थापित की जाती है जहां उनकी कथित जाति से संबंधित लोग निवास करते हैं इसके पीछे क्या सोच स्वार्थ और अभिप्राय निहित है? क्यों बसना में ऐसी खतरनाक स्थिति बनती है कि मानो दो निर्जीव मूर्तियां इतिहास के पन्नों से बाहर तलवारें मांजते हुए बीच चौक पर उतर जाती है और शक्ति प्रदर्शन पर आमादा हो जाती है? क्या वहां जातीय संघर्ष की आहटें नहीं सुनाई पड़ती? क्यों असहमत दूसरे वर्ग की परंपरागत मान्यता व भावनाओं को ठेस पहुंंचाने के उद्देश्य से ही मूर्ति स्थापना का षडय़ंत्र रचा जाता है? क्यों प्राचीन विश्वासों के प्रतीक नामों और स्थानों को मिटाने का कदाचार किया जाता है? जो सांस्कृतिक आर्थिक व राजनैतिक आक्रमण की दादागिरी ही होती है।
सावधान व सचेत हो जाने का समय आ गया है कि हम उन कारणों का विश£ेषण करें जो इन विविधताओं, असमानताओं और समस्याओं को परिपूर्ण देश की राष्ट्रीयता को दुर्बल करते हैं। समस्याओं ने देश की आम जनता को कुंठित अनुदार संकीर्ण और गुस्सैल बनाया है। अंधेरे में अंधे की लाठी खो जाने की दशा है अत: महापुरूषों की मूर्ति बीच सडक़ पर खड़ी कर सहज यातायात व निर्विध्न परिवहन में अवरोध खड़ा नहीं किया जाय। अवरोध से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है भीड़ कुहराम और आपाधापी से परेशान यात्री किसी मूर्ति से प्र्रेरणा लेने की मनोदशा में बिल्कुल नहीं रहता स्वयं मूर्ति भी धूल धूसर कीच कीचड़ धुुुंआ बद्बू और गड्डों से भरी सडक़ पर सम्मानित सुरक्षित व अनुकरणीय नहीं होती। अधिकांश मूर्तियां अव्यवस्था का शिकार हो जाती है वे आसानी से कुत्ता बिल्ली बंदर कौआ कबूतर गौरेया मैना उल्लू आदि पशु पक्षियों के साथ शातिर बदमाशों चोर उचक्के लफंगों के द्वारा प्रदूषित खंडित और अपमानित हो जाती है। देश की अधिकांश सडक़ों पर अधिकांश मूर्तियां निराहत निराश्रित और उपेक्षित रहती हैं यह सडक़छाप सम्मान का बेहूदा नमूना बनती है कि उनकी साफ सफाई रंग रोशन तक नहीं होता, जन्मदिन तक में भूला दिये जाते हैं. मूर्तियां निष्प्राण होती हैं, काश वे अपनी पीड़ा व्यक्त कर पाती कि सजीव मनुष्य भी सभ्यता की सीमा का अतिल्लंघन कर एक बर्बर अराजक समाज के गठन की ओर प्रवृत्त हो रहा है. काश! काश कि मूर्तियों की सांसें लौट आतीं … विश्वास के अलस भोर में …
सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा, तोषगांव

    Print       Email
  • Published: 5 months ago on May 19, 2018
  • By:
  • Last Modified: May 19, 2018 @ 9:14 am
  • Filed Under: Editorial

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

You might also like...

और गांधी जी हंसते ही रह गए नोटो पर

Read More →

Hit Counter provided by Skylight