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मानसुन की ताकती आँखें …. करें आत्मचिंतन

By   /   June 27, 2018  /   No Comments

भारतीय अर्थ व्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है तथा कृषि का बहुतायत भण्डार खरीफ फसल है। खरीफ फसल भारतीय कृषि का आधार है और यही मूल-आधार मानसून पर निर्भर है। भारत में मानसूनी वर्षा का 70 प्रतिशत बारिश जून से सितम्बर के मध्य होती है, पिछले दो वर्षों की तुलना में इस वर्ष यह उम्मीद जताई जा रही है कि बारिश सामान्य के आसपास हो सकती है। किसान भी यही चाहते हैं ऐसा ही हो और बादल जमकर बरसे। परन्तु मानसूनी हवाओं का मिजाज भी घोषणाकारी एवं आश्वासन दाता नेताओं की तरह लगने लगा है। मानसूनी पूर्वानुमान के आधार पर जून का दूसरा और तीसरा सप्ताह पहली खेप में पर्याप्त पानी देकर जाता है। इस बार भी मानूसन समय पर आया परन्तु ऊंट के मुंह में जीरा की तरह हल्की बारिश ही करवाया। ऐसी परिस्थिति मे केवल मानसूनी हवाओं पर अपना गुस्सा या सारा दोष मड़ देना ठीक नहीं है। समुद्री हलचल, चक्रवात, कम दबाव का क्षेत्र आदि भी वर्षा के संवाहक होते हैं। परन्तु महासागरीय असंतुलन के साथ-साथ जमीनी तौर पर स्वयं द्वारा बनाए कारणों पर चिंतन किया जाना चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रदूषण, नदियों मे बहाई जा रहे अपशिष्ट की मात्रा भी मानसूनी वर्षा का बाधक बताई जा रही है। आज हम अपने कल के लिए जल की चिंता करें अन्यथा अन्नदाता कृषक को ही समस्या नहीं होगी बल्कि सम्पूर्ण जीव जगत के लिए विकराल समस्या बन सकती है। इस बार फिर से कृषि कार्य पिछडऩे लगा है यदि बचे हुए जून में और जुलाई के प्रथम सप्ताह में अच्छी बारिश हुई तो कृषि कार्य समय पर हो सकता है पर पूर्वानुमान के संकेत अब तक सही नही रहे है।
भारतीय खरीफ फसल के उत्पादक राज्यों में बारिश की गिरावट एवं मरूस्थली क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश चिंता का विषय है। वर्षा वाले ट्रफ रेखाओंं में पिछले कुछ वर्षों में परिवर्तन देखा जा रहा है जो कि अत्यधिक चिंता का कारण है। ऐसी परिस्थिति में नदियों को नदियों से जोडऩे की योजना पर कार्य करना होगा। जल भराव एवं ठहराव के साथ भू जल स्तर के सुधार पर कार्य करना होगा। आइये हम चिंतन करें कि पृथ्वी के थल भागों में वृक्षों एवं नदियों का संरक्षण करें तथा महासागरीय जलीय प्रदूषण को रोकने हेतु बड़ी नदियों पर कार्य करें। इसकी शुरूवात हम अपने गांवों के तालाबों से लेकर हैण्डपंप एवं बोर वेल्स को सिंचाई माध्यम न बनाते हुए इनका संतुलित उपयोग करें। साथ ही पर्यावरण को प्रदूषण होने से रोकें, प्लास्टिक व थर्माकोल से निर्मित वस्तुओं का उचित डम्पिंग करें या हो सके तो उपयोग ही न करें। पानी भराव हेतु छोटे एनीकट, डायवर्सन एवं बांधों के निर्माण पर पुन: विचार कर कार्य करें। प्रकृति को संतुलित करने हेतु वृक्षों का संरक्षण, नदियों को प्रदूषण मुक्त, भू-जल स्तर के दोहन पर रोक लगाना आदि उपाय शीघ्रता से करना होगा वरना जीव जगत के लिए पानी की समस्या भयावह हो जाएगी। आइये मानसून को ताकने या गुस्सा करने के बजाय हम अपनी प्रकृति को संरक्षित करने हेतु प्रयास करें। आत्म चिंतन करें किसी विभाग या मानसून को दोषारोपण करने के पूर्व स्वयं भी चिंतन करें।
अजय कुमार प्रधान
लमकेनी (सराईपाली)

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  • Published: 3 months ago on June 27, 2018
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  • Last Modified: June 27, 2018 @ 10:44 am
  • Filed Under: Editorial

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