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महाभारत 2019 का प्रमोद पर्व

By   /   June 13, 2018  /   No Comments

हस्तीनापुर के कौरव राजवंश के भाई बटवारे की कथा वस्तु पर रचित काव्य मूलत: जय काव्य नामक ग्रंथ में संकलित हुआ था जो जन श्रुतियों के स्फुट रूपों में प्रचलित था। जय काव्य ही कालांतर में आधुनिक महाकाव्य महाभारत से नामित होकर प्रसिद्ध हुआ जिसके मूल कवि व्यास माने गये। महाभारत उस प्रकार की रचना नहीं है जैसी एक विशेष कवि ने एक विशेष समय में एक शीर्षक के अधीन रामचरित मानस या गोदान या गीतांजली की रचना की थी। कई विद्वान महाभारत को शतकों लम्बी संस्कृत काव्य धारा में से संकलन मानते हैं। आज महाभारत एक युद्धक महागाथा है जो रामकथा जैसी लोकप्रिय है, शब्द विन्यास से प्रथम दृष्टि में महाभारत एक भूखण्ड का नामकरण है जो आगे चलकर राष्ट्र की भौगोलिक सीमा में रूढ़ हो गया है, परंतु वस्तुत: महाभारत एक महाकाव्य है जिसमें एक महायुद्ध का वर्णन है, वह हमारी स्मृतियों में धरोहर बनकर जीवित है और इतिहास परंपरा पुरातत्व से होकर संस्कृति और मिथकों तक फैला हुआ है। इस शब्द का बहुतायत में उपयोग होता है, आजकल हिन्दी पत्रकारिता में सर्वाधिक प्रसार का दावा करने वाला दैनिक अखबार अपने अंकों में महाभारत 2019 के नाम से आगामी लोकसभा चुनाव 2019 की विभिन्न दृष्टियों से पड़ताल कर रहा है, स्पष्ट है चुनाव मानो युद्ध है। यहीं चिंता और चिंतन का विषय है जिधर विरलों का ध्यान जाता है, मेरी सोच व समझ में लोकतंत्र के उद्भव, विविध मतों का समन्वय, परिभाषा और उसकी स्वीकृति, बहुमत से निर्वाचित शासन प्रणाली, स्वतंत्रता, मूल अधिकार और कर्तव्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिकता, उसका समयानुकूल विकास, परंपराऐं, लिखित विधान आदि से जिस लोकतंत्र की सैद्धांतिकी और मानविकी का प्रारूप नियत हो रहा है वह अयुद्धक, युद्धविरोधी, युधि हिंसा का नकार, प्रतिकार, प्रतिवाद और अहिंसक उपचार है। जिस दिशा में वैश्विक लोकतंत्र का उभार हो रहा है वहां इस प्रकार का पथ बनता है, क्योंकि ये विचार भी अन्तर्धारा (अण्डर करेंट) सी प्रवाहित है कि लोकतंत्र महज एक शासन प्रणाली नही वरन एक जीवन शैली भी है। लेकिन इसको नकारा नही जा सकता कि जिन परिस्थितियों के बीच लोकतंत्र का सूत्रपात हुआ उसके पीछे कई कारणों में युद्ध एक प्रमुख व अपरिहार्य कारण रहा है। विश्व के अर्वाचीन परिदृश्य में युद्ध कभी भी हाशिए पर नहीं रहा। भले ही मंच में यवनिका के कभी आगे कभी पीछे कभी दृश्य कभी अदृश्य होता हुआ अपनी अनिवार्यता सिद्ध करते हुए केन्द्रीय भूमिका निभाता चला आ रहा है। तब भी लोकतंत्र का लक्ष्य और आदर्श कभी भी युद्ध नहीं है, लेकिन संसार के सफल लोकतंत्र की प्रयोगशाला होने के उपरांत भारत बाहर और भीतर दोनों ओर से युद्ध पीडि़त है जिसका सामना और समाधान उसकी प्राथमिकता है। अत: पे्रस के द्वारा महाभारत 2019 का शीर्षक देना असामयिक असंगत और संदर्भहीन नही लगता, जमीनी राजनीति के अनुसार महाभारत का उद्योग पर्व आरंभ हो चुका है, उद्योग पर्व में महायुद्ध की विभिन्न कोणों से तैयारी के लिए उपक्रम, उद्यम रणनीति नियमन, सैन्य संगठन, शत्रुनाश के अस्त्र शस्त्रों का निर्माण और संग्रहण आदि की कूटनीति रचना आवश्यक है जिसकी नींव कर्नाटक राज्य चुनाव में पड़ चुकी है। यह दोहराया जाना आवश्यक है कि लोकतंत्र का युद्धक रूपक विरोधाभासी हिंसक उत्तेजक और अपशकुन से भरा है, जो देश के सार्वजनिक जीवन में सप्रमाण उपस्थित रहता है। युद्ध लोकतंत्र की हार और नकार दोनों है। लोकतंत्र के भारतीय संस्करण की और ध्यान दें तो पायेंगे कि वर्तमान आधुनिक या वैज्ञानिक शताब्दी में भी देशी राजनीति का केन्द्रक तत्व धर्म, आस्था और राजा बने हुए हैं जो लोकतांत्रिक परिधान पहनते बदलते रहते हैं। भाजपा एक राजनैतिक दल की आत्मा में धर्म है जो सत्ता के लिए सांगठनिक रूपों में अंतरित होता रहता है। आज भाजपा अतिशय आत्मविश्वास से लबरेज और मुखर है। लोकसभा 2014 में प्रचण्ड संख्या की जीत में क्रमश: ह्मसमान दर्ज होता दिखता है जो गत चार वर्षों के उपचुनावों के परिणामों से जाहिर होता है तथापि सरकार व भाजपा प्रमोद पर्व मनाने में मस्त है, उनके भाल पर महाभारत 2019 की आशंकाओं की कोई लकीर दिखाई नहीं देती क्योंकि उसका आकलन है कि आंकड़े देश की अंदरूनी वास्तविकताओं का आईना नहीं है, स्पष्ट मानना है कि पार्टी ने सरकार के द्वारा देश में विकास की गंगा लाई और बहाई है। विपक्ष के अनुसार यह प्रमोद में छाया प्रमाद है। निर्भिक पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेई ने भाजपा के चार वर्षीय शासन प्रशासन की कई बानगियां प्रस्तुत की है जो कम कहे सब कुछ कह देती है, उन पर सहमत या असहमत होना स्वयं पर निर्भर है लेकिन ध्यान देना होगा। तद्नुसार वर्तमान में परम उद्देश्य राजनीति और सत्ता है शेष सब गौण एवं दोयम है। चुनाव जीतना और सरकार बनाना सर्वोपरि है जहां साधन की पवित्रता बनाये रखने की गांधीवादी शैली कालातीत भावना है। प्रधानमंत्री ने संसद को लोकतंत्र का मंदिर और स्वयं को प्रधान सेवक कहा है, शासन को कांग्रेस की अभिशापित छाया से मुक्त करने के लिए भाजपाई शैली अपनाई गई है जो घोषणाओं के धुंआधार से प्रतिध्वनित और प्रतिबिम्बित होती है। गत चार वर्ष याने 1448 दिनों में 104 योजनाओं का ऐलान हुआ, याने हर चौथे दिन एक नई योजना घोषित हुई। घोषणाओं के क्रियान्वयन की सफलता विफलता के आकलन की कोई एजेंसी नियुक्त नहीं, किसी स्वतंत्र एजेंसी में जमीनी स्तर पर समीक्षा करने का दम नहीं। कोई एजेंसी दुस्साहस करे तो खारिज होने का खौफ मौजू रहा। अधिकांश योजनाऐं हवा कागज और मीडिया में शब्दों के माध्यम से आते ही दम तोड़ गई, उन्हे याद करने को कोई तैयार नहीं। योजनाओं की बानगी सांसद आदर्श ग्राम योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जन औषधि योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत योजना, किसान विकास पत्र, मृदा स्वास्थ्य पत्रक योजना, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, मिशन इंद्रधनुष आदि। एक राष्ट्रीय कार्यक्रम मनरेगा का हाल देखिए 100 दिनों का दैनिक काम 10 प्रतिशत मजदूरों को नहीं मिलता, देश में 25 करोड़ मनरेगा मजदूरों में सिर्फ 12 करोड़ मजदूरों के पास कार्ड है, लेकिन काम 1 करोड़ मजदूरों को नहीं मिलता। इधर प्रधानमंत्री हर 27 वें दिन विदेश यात्रा पर रहे, उनने लगभग 80 विदेशों की यात्रा पूरी कर ली, वे 155 दिन देश से बाहर विदेश में बिताये, सबको याद होगा कि कालाधन गत चुनाव 2014 में जबर्दस्त मुद्दा था जिसका बवन्डर विश्वभर में चर्चित हुआ था लेकिन आज कोई नाम लेवा नहीं, कितना कालाधन सफेद हुआ और स्वदेश आया किसी को पता नहीं, परंतु एक बात जरूर हुई कि कालाधन देश में हो या विदेश में उसे पार्टी फण्ड में जमा करने की छूट दे दी गई। आज राजनैतिक दल खासकर भाजपा की ओर कालेधन की अजस्र धारा बह रही है और पार्टियां कानून से ऊपर हो गई तथा सरकारों से भी अधिक शक्तिशाली हो गई, परिणाम यह सारत: निकल रहा है कि चुनावी जीत ही अंतिम (अल्टीमेट) हो गई जिसे हथियाने के सारे तरीके जायज हो गये। यह भी फैशन चल पड़ा है कि विश्व की सबसे बड़ी युवाशक्ति जो भारत की है, रचनात्मक दिशा से विमुख होकर केवल पूंजी के पीछे पडक़र स्वयं का राजनीतिकरण कर रही है। श्रम प्रतिभा साधना आदि शार्टकट के शिकार हो गये। लोकतंत्र की लोकव्यापी भावना और मर्यादा को कुचलकर केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति इतनी तीव्र हो रही है कि मानो एकतंत्र की सत्ता हो। याद रखना होगा कि एकतांत्रिक सत्ता चाहे तानाशाह हो राजा हो या जन प्रतिनिधि हो वह व्यक्तिवाद का जोरदार पृष्ठपोषण समर्थन और संरक्षण करती है, यहां नरेन्द्र मोदी अपने समस्त पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की लीक व छवि से परे हटकर दिखाई देते और लगते हैं। यथार्थत: प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) दिल्ली में पूरे शासन तंत्र का केन्द्र बिन्दु बन चुका है, इसलिए विदेश, अर्थ, शिक्षा, स्वास्थ्य,रेल, किसान राज्यों के चुनाव, आतंकवाद से लेकर बिगडैल पड़ौसी देशों को साधने तक या महाशक्तियों, वैश्विक संस्थाओं और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आदि के व्यापक क्षेत्रों में संतुलन बनाने में प्रधानमंत्री का हाथ दिखाई देता है, परंतु एक जीवंत राष्ट्र में इसके पाश्र्व प्रभाव (साईड इफेक्ट) पडें़ेगे ही, राजनीति नहीं बच सकती। लोकतंत्र की सुनिश्चित सफलता के लिए अनिवार्य वैधानिक व स्वायत्त संस्थाओं को पंगु विवश निर्णयभीस और सत्तामुखी बनाना काफी खतरनाक है जिसकी प्रक्रिया कांग्रेसी शासन काल से शुरू कर दी गई थी। लोकतंत्र चौखम्बा राज है जिसके सभी पाए मजबूत होना चाहिए, संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र आयोग (निर्वाचन, वित्त, सूचना आदि) रिजर्व बंैक जैसी अनेक संस्थाओं का अवमूल्यन और क्षरण चिंता का विषय है। न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष, सेनापति, निर्वाचन आयोग का अध्यक्ष आदि माननीय पदाधिकारी शासन के समक्ष सेके्रटरी या अण्डर सेक्रेटरी जैसा नौकरशाही व्यवहार पायें तो चिंताऐं बढ़ जाती है, इसलिए वैश्विकरण और उदारीकरण की अंधी दौड़ में देश की बुनियादी समस्याऐं गरीबी, रोग, अशिक्षा, असमानता, महंगाई, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक व घरेलू असुरक्षा एवं हिंसा, प्रदूषण, कृषि व वन का विनाश, जातिवाद, आतंकवाद, भाषावाद, अलगाववाद, जल संकट, ऊर्जा संकट एवं ग्लोबल वार्मिंग आदि अनसुलझी पड़ी-पड़ी साल दर साल दुरूह और दुसाध्य बन रही है और शर्मनाक यह है कि इनके निदान की दीर्घकालीन सोच व तलाश बंद है, ये मसले देश व सरकार की प्राथमिक सूची से गायब है जिनसे आम जनता का सीधा सरोकार रहता है। मुख्य मंच में नेतागिरी और राजनीति बाजी के कारनामे हैं जो सबसे बड़ा पाखंडी लाभकारी उद्योग बन चुका है। लोकतंत्र पक्ष व विपक्ष का सही संतुलन है जहां विपक्ष (विरोध या विमत) की अनिवार्यता है, परंतु सत्ता के द्वारा विरोध का गला घोंटना लोकतंत्र की हत्या है, भारत भावना पूर्ण सहिष्णु और समावेशी राष्ट्र का पर्याय है जिसकी सनातन छवि है जहां महाभारत 2019 प्रस्तावित है। यद्दपि नरेन्द्र मोदी चुनौति विहीन, अपराजेय एवं लार्जर देन लाईफ की छवि लिये दिखाये जा रहे हैं जिनके ही नेतृत्व में तथाकथित युद्ध होना है। एक संदेश ऐसा फैलाया जा रहा है कि वे आगामी इवेंट के सुपरमेन हैं जिनके हाथ में हिन्दूत्व की जादुई छड़ी है जो 2014 की तरह 2019 में कारगर होकर रहेगी, शायद प्रमोद पर्व के पीछे यह स्पष्ट विजन है।
सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा तोषगांव
मो- 96692-74393
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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  • Published: 4 months ago on June 13, 2018
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  • Last Modified: June 13, 2018 @ 9:11 am
  • Filed Under: Editorial

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