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बिखर रही है आजादी की आशाऐ सपना था बापू का

By   /   September 26, 2018  /   No Comments

अवधेश अग्रवाल

बिखर रही है आजादी की आशाऐ
सपना था बापू का
राम राज्य हम लायेगें
दंगा फसाद होते हैं नित
प्रताडि़त होती है अबलाएं
बिखर रही है आजादी की आशाऐ।
चाचा नेहरू ने प्रगति का
फूंका था सपनीला बिगुल
धर्म निरपेक्ष देश होगा हमारा
होती नित साम्प्रदायिक घटनाऐ
बिखर रही है आजादी की आशाऐ।
देश पहले था पीछे थे हम
शांत जीवन था अमन चैन था
सीमा पर करके घुसपैठ
एकता पर किया आघात
दिखा दी हमारी दुर्बलताऐं
बिखर रही आजादी की आशाऐ।
राजनीति की प्रेरणा से
आज हमें खुली सांस मिली
घोल रही है जहर आज इसमें
राजनीति हो निज लाभ को
जन सेवा देश भक्ति की
सिमट रही है भावनाऐं।
बिखर रही है आजादी की आशायें ।

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  • Published: 4 weeks ago on September 26, 2018
  • By:
  • Last Modified: September 26, 2018 @ 4:01 pm
  • Filed Under: Poetry

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