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फुलझर का गौरव- शिशुपाल पर्वत शिशुपाल प्रोजेक्ट – पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास

By   /   May 30, 2018  /   No Comments

प्रभात कुमार भोई
प्राचार्य शाउमा विद्यालय-पैकिन

सराईपाली। महासमुन्द जिले के सराईपाली विकासखण्ड मुख्यालय से 15 किमी की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 से दक्षिण की ओर 05 किमी की दूरी पर स्थित शिशुपाल पर्वत की लंबी श्रृंखलाऐं लम्बाई लगभग 09 किमी पूर्व से पश्चिम, ग्राम घुचापाली से बनहरडीह के वन सीमा तक, चौड़ाई 06 किमी उत्तर से दक्षिण, पुटका से गेर्रा के वन सीमा तक तथा ऊंचाई 899 मीटर, अपनी नैसर्गिक सौंदर्य एवं विविध, बहुमूल्य व प्रचुर प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण है, जहां पर स्थित लम्बे-ऊंचे शैलखण्ड, ऐतिहासिक व पुरातात्विक स्थल (शिवालय, भुईना गढ व बिल) प्राकृतिक गुफाऐं (भागवत गुफा) लंबी-लंबी सुरंगे बारहमासी झरनें (पाटझरना व कलशी कुण्डी, आम झरना) बरसाती जलप्रपात- (घोड़ा धार जलप्रपात) तथा विलुप्त प्राय: वन्य जीव पेंगोलिन (सल्क) स्याहस, अंधी-मछलियां, पेड़-पौधे, वनोषधियॉं बहुरंगी लताऐं, सफेद व पीला पलास, राही लता पलाश यहां की हरियाली, पर्यावरण पे्रमियों, पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है।
वर्तमान में मानव की स्वार्थी व हिंसक प्रवृत्ति से वन विनाश का खतरा मंडराता जा रहा है, पेड़ों की अंधाधुध कटाई, जंगलों में भीषण आगजनी, फंदे व बिजली तार द्वारा वन्य जीवों का शिकार आदि से यहां के विलुप्त प्राय: वन्यजीवों तथा बेजुबान पेड़ पौधे आतंकित हैं। कुछ समय पहले क्षेत्र के ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने शासन-प्रशासन से इस ज्वलंत समस्या के त्वरित समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की है, जिससे इस धरोहर का संरक्षण व संवर्धन किया जा सके।
शिशुपाल के ऊपर व तलहटी का भ्रमण, अवलोकन, अध्ययन करने के पश्चात शिशुपाल प्रोजेक्ट तैयार किया गया है जो निम्नलिखित है-
पर्वतीय झरनों व जलाशयों में जल संग्रहण कर सिंचाई सुविधा व मत्स्य पालन कार्य।
कालीदरहा व बस्तीपाली के वनक्षेत्र में मधुमक्खी पालन व कोशा पालन, शहद व रेशम उत्पादन।
ईंट निर्माण व विक्रय।
जैविक खाद व जैविक खेती को प्रोत्साहन।
भेड़-बकरी पालन।
सियाल पत्ता, लता पलाश से दोना पत्तल उद्योग।
वनोपज चिरौंजी, महुआ, ईमली, हर्रा, बेहड़ा इत्यादि का संग्रहण केन्द्र व विपणन केन्द्र। तेंदूपत्ता संग्रहण।
वनौषधि, बिदारी कंद, जीमीकंद, सत्तावर, मकोया, गिलोला इत्यादि का उत्पादन व विक्रय।
पुजारीपाली नर्सरी के समान बस्तीपाली आमझरना के नीचे या अंतरझोला (भूमिगत से अजस्र बर्हिगत जलस्रोत से) फूल व फल नर्सरी विकसित करना।
पक्षी संरक्षण केन्द्र। गौपालन व संरक्षण क्षेत्र। बांस-शिल्प, झौंवा, झारा, पर्रा, टोकरी सूर्पा, निर्माण कार्य। खजूर व लंबे घास से झाड़ू निर्माण कुटीर उद्योग। चूना पत्थर, जिप्सम, बॉक्साईड खनिज दोहन। घोड़ाधार प्रोजेक्ट के तहत पर्यटन स्थल के रूप में विकास।
सारांश यह कि शिशुपाल पर्वत क्षेत्रवासियों के लिए वरदान है। इसकी तलहटी सीमा में पर्याप्त जल भंडार है, इस पर्वत के चारों ओर बसे गांव के किसान-मजदूर रबी फसल (ट्यूब बेल से) धान, गेहूं, साग-सब्जी उत्पादन कर आय का उपार्जन कर रहे हैं। लोग जंगल से वनोपज संग्रहण कर विक्रय कर आय प्राप्त कर रहे हैं।
गौरतलब है कि शिशुपाल प्रोजेक्ट के तहत यदि इसके निचले सीमा के चारों ओर चिन्हांकित व उपयुक्त स्थलों पर शासन द्वारा हितग्राही रोजगार मूलक योजनाओं को क्रियान्वित करते हुए रोजगार केन्द्रों की स्थापना की जाय तो हजारों बेरोजगारों को रोजगार प्राप्त हो सकेगा तथा शासन को एक रूपया व्यय के एवज में लगभग पचहत्तर रूपये की सालाना आमदमी प्राप्त होगी। लोगों की आवाजाही बढऩे से पर्वत का संरक्षण व संवर्धन हो सकेगा।
अन्ततोगत्वा भावी पर्यावरणीय संकट व ग्लोबल वार्मिंग के भयावह दौर ेमें समय रहते पर्यावरण पे्रमियों, शासन प्रशासन के नीति निर्धारकों को चिन्तन मनन कर, आवश्यक रणनीति बनाकर प्रभावी क्रियान्वयन करना होगा तथा आम नागरिकों में पर्यावरणीय संचेतना का प्रचार-प्रसार करना होगा। आईये सबके समन्वित व सक्रिय प्रयास से इन बेजुबान पेड़-पौधों व वन्यजीवों के संवर्धन व संरक्षण करते हुए पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास के संकल्प को साकार करेंगे।

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  • Published: 5 months ago on May 30, 2018
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  • Last Modified: May 30, 2018 @ 9:53 am
  • Filed Under: Editorial

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