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पुत्र को पत्र

By   /   June 13, 2018  /   No Comments

बेटा
अब गांव मत आना
शहर में ही रहना।
हमारा गांव
अब वो गांव नहीं रह गया।
गांव के पुराने लोग
सब गांव छोड़ कर जा चुके हैं।
गरीबी के कारण
उनकी जमीनें बिक चुकी हैं।
बाहर से पैसे वाले आकर
हमारे गांव में
बड़ी संख्या में बस गए हैं।
गांव के जो किसान
बाहर नहीं जा पाए हैं
वे इन बाहरी लोगों के
नौकर बन गए हैं।
खेती की जमीन पर
बड़े बड़े मकान बन गए हैं।
खेतों में जिन लहराती फसलों को
देख कर तू खुश होता था।
वो सारी फसलें गायब हो चुकी हैं।
जिन पेड़ों पर चढ़ कर
फूल पत्ते और फल तोड़ा करता था
वो सारे पेड़ कट चुके हैं।
गाय बैल एवं मवेशियों की संख्या
बहुत कम हो गई है।
गांव में अब दूध दही की
नदी नहीं बहती।
जिन तालाबों में तू तैर कर
कमल के फूल तोड़ा करता था
वो सारे तालाब सूख चुके हैं।
और उनमें अवैध कब्जे हो गए हैं।।
अमृत जैसे मीठे पानी वाले
सारे कूंए सूख गए हैं ।
उन कुंओं में
अब कचरा फेंका जाता है ।
बेटा हमारा घर भी
फोर लेन सडक़ के एरिए में
आने के कारण तोड़ दिया जाएगा ।
मुआवजा मिलते ही
मैं खुद तेरी मां के साथ
शहर आ रहा हूं।
बेटा तू शहर में ही रहना
गांव मत आना।
तेरा दुखी पिता।।
प्रवीण प्रवाह
श्रंखला पिथौरा, मो. 9009188962

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  • Published: 2 months ago on June 13, 2018
  • By:
  • Last Modified: June 13, 2018 @ 9:09 am
  • Filed Under: Poetry

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