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पावस के महिना आगे

By   /   July 3, 2018  /   No Comments

पावस के महिना आगे
आगे, आगे जी
पावस के महिना आगे।
झमा-झम होवे रे बरसा
भुंइया के पियास बुझागे।
खेती किसानी के बुता शुरू
नांगर बईला हर फंदागे।
बासी लेके जायेबर परही
नवा बहुरिया ह लजाके।
आगे, आगे जी
पावस के महिना आगे।।
तरिया, नदिया ह भरे लगिस
घचवा डबरा ह टमटमागे।
धुर्रा-माटी ह सपटगे हे देख
पेड़ पऊधा मन हरियागे।
गरमी ले तन ल राहत मिलगे
जीव जन्तु मन के जीव जुड़ागे।
आगे, आगे जी
पावस के महिना आगे।।
छानी परवा ओईरावत हे
डेहरी म झिपार बंधागे।
बढ़ दिन ले सुरतावत रहिस
छाता के बुता अब बाढग़े
फुदरत खेलत हे लईकामन
इसकूल जायबर बसता ह बंधागे।
आगे, आगे जी
पावस के महिना आगे।।
फांफा फि रकी अड़बड़ होगे
देह के घमुर्री ह ओझल होगे।
सब काम बुता म मगन होगे
बर-बिहाव घलऊ ह सिरागे
नीक लागे ए जुड़हा मऊसम
गजब सुहाये अंतस ल गदगदाये।
आगे, आगे जी
पावस के महिना आगे।।
महेतरु मधुकर
पचपेड़ी, मस्तूरी, बिलासपुर (छ.ग.)

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  • Published: 3 weeks ago on July 3, 2018
  • By:
  • Last Modified: July 3, 2018 @ 10:37 am
  • Filed Under: Poetry

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