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पंडि़त दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद

By   /   October 19, 2014  /   No Comments

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के नागरिकों को उम्मीद था कि जिन लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया उनके लिए अच्छे दिन जरूर लाएंगे। सबको उनका हक मिलेगा पर उनके उम्मीद पर पानी फिर गया क्योंकि ऐसा कुछ नहीं हो पाया कि आम जनता के अच्छे दिन आते। सब कुछ उसी तरह सामान्य रहा। हां इतना जरूर हो पाया कि उनको अपने उपर शासन करने वालों को चुनने का अधिकार मिल गया वे भी यही लोग थे जो स्वतंत्रता आंदोलन मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिए थे तब तो एक दिन अच्छे शासन देने की सुराज की बात की थी पर उनके लिए ही स्वराज हो कर रह गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले तो सब एक थे पर बाद मे ये कई दलों मे बंट गए और अपनी ढपली राग अपना राग अलापने लगे सबके जेहन से आम जनता के भलाई वाली बात निकल गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के सत्रह वर्ष ऐसे ही गुजर जाने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मन मे छटपटाहट होने लगी, एक सुनिश्चित विकास न देख अपनी मन की बात लोगों के सामने एकात्म मानववाद के नाम से समुचित,सामुहिक विकास के एक रूप रेखा देश के पास रखी। उन्होंने वर्तमान परिस्थिति के कारण भी ताए कि अभी के बिखराव के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले की लापरवाही एवं दूरगामी सोच की कमी को दोषी ठहराया जो अक्षर स: सत्य है। उस वक्त गंभीरता पूर्वक सोच लिया जाता कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की रूप रेखा कैसी होगी किस राह पर आगे बढ़ेंगे तो ये दशा आज देश की नहीं होती।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टि से उन दिनों कुछ नेताओं के द्वारा जिनमे महात्मा गांधी एवं लोकमान्य तिलक भी शामिल थे। उठाए गए एवं सुझाए गए बात पर ध्यान दिया जाता तो आज जिस तरह से हमारे सभ्यता संस्कृति का ह्रास हो रहा है। सर्वहरा वर्ग को संबल नहीं मिल पा रहा उनकी दसा जस की तस बनी हुई न होती। अमीर और अमीर न बनकर देश के सभी जनों का यथोचित विकास होता। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के तब यह बात रखी थी कि यह बात तय कर ली जाए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की दिशा क्या होगी किस मार्ग पर चलने से विकास होगा पर स्वतंत्रता प्राप्ति को मुख्य उद्देश्य मानकर यह कहते हुए बात को टाल दी गई कि तब तो अपने बीच की बात होगी तय कर लेंगे पर ऐसा हो नहीं पाया और समग्र विकास की आम जनता के आस पर कुठाराघात हो गया।
स्वतंत्रता प्राप्ति को हम तभी सफल माने जब समाज के नीचले तबके के लोगों का विकास हो। पंडि़त जी के एकात्म मानववाद का अर्थ ही यही था कि व्यक्ति व्यक्ति मे भेद न किया जाए और उन लोगों के विकास मे ध्यान केंद्रीत किया जाए जिन्होने परतंत्रता के समय गुलामों की जिन्दगी बसर की है और इसके लिए व्यक्ति को उपकरण से पैसों से अधिक महत्व दिया जाए। पैसे व उपकरण साधन ही रहने दिया जाए साध्य न बनाया जाए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद इस बात को समग्र विकास की आत्मा माना जैसे आवश्यकता के अनुसार आविष्कार हो न कि आविष्कार को आवश्यकता मानकर उपभोगवाद को बढ़ावा दिया जाए ऐसा होने पर पूंजीवाद को बढ़ावा मिलेगा और वही हो गया।
धन का विवेक पूर्वक विनियक होना आवश्यक था पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जन कल्याण के जगह पर व्यक्तिगत जन कल्याण के लिए उपयोग होने लगा जो एकात्म मानववाद के विपरीत है। विकास को हम किस रूप मे देखें यह मुख्य बात होनी चाहिए पर यहां पर हमसे चुक हो गई इस पर पंडित जी का मानना है कि स्वाभिमान के रक्षा करके ही हम अपनी सभ्यता संस्कृति आदर्श नैतिकता की रक्षा कर सकते है अन्यथा हमारा मनोभाव तो इसके विपरीत होगा।
आवत ही हरसै नहीं नैनन नहीं सनेह तुलसी तहंा न जाइए कंचन बरसै मेह। हमे वह विकास कतई स्वीकार नहीं होनी चाहिए जहां हमारे मान सम्मान की रक्षा न हो पाए। एकात्म मानववाद का उद्देश्य केवल बहुजन हिताय बहुजन सुखाय नहीं है उसका तो उद्देश्य है समग्र मानव जाति का हिताय सुखाय एकात्म मानववाद का सिद्धान्त यह सिद्ध करता है कि अर्थ धर्म और राजनीति एक दुसरे के पूरक है एक के बिना दूसरा अधूरा ही नहीं खतरनाक भी हो सकता है। धर्म के पोषक व्यक्ति के पास अगर एक सीमा तक धन अर्थ न हो तो अपने पेट भरने के लिए चोरी डकैती जैसे पाप कर्म भी उसे करना पड़ सकता है उस स्थिति मे वह धर्म की रक्षा नहीं कर सकता ठीक यही हाल राजनीति का है धर्म विहीन राजनीति पक्ष भ्रष्ट होगी इसमें दो राय नहीं क्योंकि उसे पाप पुण्य का भय नहीं होगा और स्वार्थ सिद्धी का ही जरीया बनेगा इसमें दो मन नहीं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्तासीन हुए नेतागणों मे यह भाव जागृत हो गया कि वे आम जन से विशिष्ट है इसे साबित करने के लिए उनको एक ही रास्ता सुझता अपने रहन सहन खान पान भी आम जनता से अलग होना चाहिए इसलिए अंग्रेजीमत को अपनाते हुए पहनावा भी उनका अपनाया यहां तक तो ठिक था पर भारतीय संस्कृति की रक्षा न कर पाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी जिसके कारण विसंगतियां नजर आने लगी। भारतीय संस्कृति की जड़ इतनी गहरी है इतनी मजबूत थी कि उसे कोई भी तुफान नहीं हिला पाया और पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी कायम है। जिसके दम पर भारत आज भी विश्व गुरू बनने के मार्ग पर अग्रसर है वह देश जिसने अपनी छाप भारत पर छोड़ गया भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को मानव कल्याण के लिए आवश्यक माना।
पंडित जी के एकात्म मानववाद के अनुसार व्यक्ति व्यक्ति का विरोधी न होकर सहयोगी होना चाहिए जो हमारी सभ्यता एवं संस्कृति के भीतर ही संभव है। पूंजीवाद अपने से नीचले तबके लोगों को उपयोग की वस्तु समझकर व्यवहार करते है जो भेद भाव को जन्म देती है। पंडित जी मानते हैं कि विविधता मे एकता अथवा एकता का विविध रूपों मे व्यक्तीकरण ही भारतीय संस्कृ ति का केंद्रस्थ विचार है। यदि हम इस तथ्य को हृदयंगम कर लें तो फिर विभिन्न सत्ताओं मे संघर्ष नहीं हेागा यदि संघर्ष है तो वह प्रकृति अथवा संस्कृति का द्योतक नहीं है विकृति का द्योतक है। पंडित जी यह भी मानते हैं कि संस्कृति प्रकृति की अवहेलना नहीं करती बल्कि प्रकृति मे जो भाव सृष्टि है उनको बढ़ावा देकर दुसरी प्रकृतियों के बाधा को रोकना ही संस्कृति है।
पंडित जी के कथनानुसार किसी भी राष्ट्र की एक आत्मा होती है उससे अलग जाकर विकास एक विकृति को जन्म देती है आगे चलकर भारत मे भी यह देखा जा सकता है यही कुछ आज हो रहा है। नंगापन हमारी संस्कृति नहीं बड़ों के प्रति अनादर हमारी संस्कृति नहीं , जमाखोरी, कालाबाजारी हमारी संस्कृति नहीं और इसी को आज हम अपना बैठे है। जिसके चलते समाज मे विकृति उत्पन्न हो गई है एक भूचाल सा आ गया है सरे आम हत्या मिथ्या बलात्कार की घटनाएं हो रही है। पंडित जी का
मानना है कि हम व्यक्ति के भीरत परमात्मा को देखते है जिसके अनुसार हमारा व्यवहार उसके प्रति बनता है पर पश्चिम मे ऐसा कदापि नहीं, शरीर एक उपयोग की वस्तु है उसके सिवाय कुछ नहीं।
पंडित जी ने एकात्म मानववाद का सिद्धान्त 1961-62 मे प्रतिपादित किया उन्होंने जब यह देखा कि भारत अनियंत्रित विकास की ओर बढ़ रहा है स्वार्थ परता का जरीया बन गया है लोग इसके संपदा और संप्रभुता को अपना निजी संपति मान लिए है। उनके भीतर का एकात्म मानववाद जाग उठा।एकात्म मानववाद एक विचार नहीं एक आंदोलन है। पंडित जी का उद्देश्य था कि भारतियों का आत्मा जागे और पुन: अपनी सभ्यता संस्कृति संस्कार के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के हित चिंता कर विकास करे। ऐसे मे तो भारत एक बार पुन: स्वदेशी गुलाम बन जाएगा और वही हो गया। लोग यह कहने से नहीं चुकते। परतंत्रता मे इनता अंतर भर आया है पहले गोरे थे अब काले है, पहले ससुर थे अब साले है। काश स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले यह तय कर लिया जाता कि हमारे विकास का आधार क्या होता तो शायद ये विसंगतियां नहीं बनती। पंडित जी का एकात्म मानववाद का सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक है जिससे हमारी एकता और अखण्डता को बल मिलेगा।
अमृतलाल पटेल, जोगनीपाली।

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  • Published: 4 years ago on October 19, 2014
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  • Last Modified: October 19, 2014 @ 7:58 pm
  • Filed Under: Editorial

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