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धरती के प्यास बुझागे रे सँगी….

By   /   July 3, 2018  /   No Comments

धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।
खाय बर दाना जगाले रे सँगी,
चार दिन के जिनगानी।।
रुख राही सबो हरिहर हरिहर,
जीव: जंतु सबो खुशियागे।
बूँद बूँद पानी गिरके सँगी,
माटी म खुशबू छागे।।
आकाश के गरजे बादर म,
डोंगरी के नाचे बानी।
धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।।
धरती माता के छाती चीरे,
नांगर म चलाके।
दु:ख पीरा सबो सहगे रे सँगी,
तोर खुशी ल पाके।।
भाई भाई म देखतो सँगी,
डोली के करत हे निगरानी।
धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।।
राकेश चतुर्वेदी (जमनीडीह)

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  • Published: 3 months ago on July 3, 2018
  • By:
  • Last Modified: July 3, 2018 @ 10:40 am
  • Filed Under: Poetry

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