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धनुजात्रा: नाटक की जड़ से फूटतीं कोपलें

By   /   December 28, 2017  /   No Comments

सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा तोषगांव
संपर्क- 9669274393
धनुजात्रा: नाटक की जड़ से फूटतीं कोपलें
विश्व विख्यात धनुजात्रा बरगढ़ (ओडिशा)अनुकरण प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में प्रथम बार बस्ती सराईपाली मे आयोजित होकर सांस्कृतिक घटना बन गया। इसी दिसबंर 2017 मे दस दिनों तक चला कार्यक्रम और उसके जीवंत दृश्य जनमानस की स्मृति में तरोताजा है। यह धर्म, पुरा-साहित्य, कला, संगीत का मनोरंजक सांस्कृतिक संमिश्रण है जो पुरे कस्बे और गांव को चलित मंच बनाता है जिसमेंं कलाकारों के नाट्य अभिनय के अतिरिक्त शेष दर्शन न केवल इस मंचस्थ नाटक का प्रेक्षक या दर्शक होता है। अपितु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिस्सेदार और भागीदारी हो जाती है। प्रेक्षक की संलग्नता अथवा दर्शक का एकल/ बहुल योग उस कथानाटक में ऐसी लोकप्रियता, रूचि और आकर्षण भर देते है कि कृति सफल दर सफल आगे बढ़ती हुई मेले के रूप मे सार्वजनिक हो जाती है। इस अथाह लोकरंजन की अद्भूत विद्या के रूप मे धनुजात्रा एक परंपरागत धार्मिक कथा पर आधारित महानाटक है। कथा कृष्णायण ही है जो जन जन में ज्ञान व प्रसिद्ध है रामलीला की भांति कृष्णकथा का शीर्षक धनुजात्रा (धनुष यात्रा) क्योंकर है, थोड़ा पेंचीदा है क्योंकि कृष्ण के व्यक्तित्व के संदर्भ में कई प्रतीक- राधा, यमुना, मथुरा, वृन्दावन, द्वारिका, गौ, दूध दही, वंशी, मोरपंख, सुदर्शन चक्र, पांचजज्य शंख आदि है। लेकिन धनुष नहीं है जबकि यह राम के व्यक्तित्व मे रूढ़ हो गया है। धनुजात्रा बरगढ़ जैसे प्राचीन नगर का चेहरा है। इस पर्व के बारे में तलाशने पर कृष्ण व धनुष से अंतर संबंधित सूत्र नहीं मिलते परंतु यह अनुमान है कि धनुजात्रा कोई सहस्रों वर्ष पुरातन नहीं है। यह नाटक नामक प्रभावकारी विद्या के विशद् विस्तार के समय का है जिस समय नाटक समाज मेें व्यापक प्रभावकारी शक्ति में मूर्धन्य था। धनुजात्रा में व्यवहृत शब्द जात्रा के बारे में स्पष्ट कर दे कि हिन्दी मे यात्रा की जो अभिधा है वह पूर्वी भाषाओं ओडिसा, बंग्ला और असमिया मे भिन्नार्थक है। जात्रा एक सामूहिक सांस्कृ तिक मेला होता है जिसमें जनसमावेश होता है। रथ जात्रा मे यात्रा और मेला का द्वैतार्थ है। धनुजात्रा उसी क्रम मे है जो ओडिसा संस्कृति मे ओडिय़ा भाषा मे अभिनीत व प्रदर्शित होता है। भारतीय नाट्य साहित्य के आदि पुरूष और प्रर्वतक भरत मुनि थे। संस्कृत में नाटक साहित्य का विशाल बहुरंगी भण्डार है जिसकी समृद्धि (परंतु समय समय पर खंडित )परंपरा में आज की आधुनिक भारतीय भाषाएं उन्नत भाव से विकसित हो रही है। जिसमें बंग्ला, ओडिशा और मराठी नाटकों से हिन्दी नाटक ज्यादा प्रभावित भी है। खड़ी बोली (हिन्दी)मे नाटक के विकास से अधिक विस्तृत उसकी उपभाषाओं की नाटक विधा है जिसकी गहन उपस्थिति उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार के लोक साहित्य मे है। उत्तर प्रदेश की रामलीला वैश्विक नाट्य रूप है। जिससे हम सब भलीभांति परिचित है। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी में तीन महानगरीय केन्द्र (दिल्ली, बंबई, कलकत्ता) नाटक मे उल्लेखनीय कार्य कर रहे है। नाटक के सफल मंचन के लिए मंच अनिवार्य तत्व है। जिसका अधिकतम विस्तार रूसी नाटकों मे देखा गया है। रूस मे एक डेढ़े फर्लांग लम्बे चौड़े मंच हुआ करते थे जिसका पारसी थियेटर्स, बंबई मे स्पष्ट लक्षण मिलते है। लेकिन मंच का मुक्ताकाशी विस्तार एक या अनेक शहर गांव में मंच के रूप मे कब से परिवर्तित हो गया उसका सम्यक विवरण भारतीय नाट्य शास्त्र में नही मिल पाता। लेकिन अनुमानत: यह नयी अवधारणा 500 वर्षो से अधिक पुरानी नहीं लगती। धनुजात्रा भी इसी नाट्य धारा का सामयिक रूप है जिसका मंचन फूलझर वासियों की हजारों की जनसंख्या ने इसी वर्ष 2017 में प्रत्यक्षत: देखा, अनुभव किया, भाग लिया और मजा किया। वैसे सराईपाली में प्रदर्शन बरगढ़ के मूल कलाकारों के द्वारा अभिनित किये जाने के उद्देश्य से समय के पूर्व संपन्न कराया गया। वस्तुत: बरगढ़ मे धनुजात्रा का दसदिनी समापन पौष पूर्णिमा (पुस पुन्नी) को हो जाता है। बरगढ़ को राजधानी मथुरा, बरगढ़ के पश्चिमी सीमांत में बहती जीरा नदी को यमुना और उसके पश्चिमी पार पर स्थित गांव अंबापाली को गोकुल (गोपपुर या नंदपुर)बनाया जाता है। अंबापाली के खेतों और निकट झुरमुट को वृन्दावन माना जाता है। समा ऐसा बंध जाता है कि बरगढ़ और अंबापाली के समस्त लोग बाग कथानक के अनुसार अपनी अपनी भूमिका में सरोबार हो जाते है और पूरा वातावरण कृष्णमय और राधा प्रेम से प्रफू ल्लित हो उठता है जो नाटक का चरमोद्देश्य भी होता है। परन्तु बस्ती सराईपाली के पास में किसी नदी या नाले की अनुपस्थिति में प्रदर्शन कला में वह वस्तु परकता (सब्जे क्टिविटी) संभव नही हुई जो अभीष्ट थी। तथापि प्रथम प्रयास स्वागतेय रहा सुंदर संयोजन को पूरी बस्ती के निवासियों के उत्साह, समर्पण, समर्थन के साथ भव्य सफलता का पूरा श्रेय मिलता है। प्रथम प्रयास में महज मनोरंजन और लोकप्रियता का लक्ष्य नहीं है तब भी उसकी कई आनुषंगिक कलात्मक सिद्धियों क आहटें सुनी जा रही है। धनुजात्रा एक नाटकीय कृष्ण लीला है जो रामलीला की तरह लोकनाट्य परंपरा का लोक व्यापीकरण है जिसमें नाटक तत्व प्रमुखता से विद्यमान है। कथा कृष्ण जन्म से कंस वध तक सघन घटनाओं का विस्तार लिये हुए है जिसमें काव्य और नाटक का सारा सौंदर्य अंतर्निहीत है। नव रसों का परिपाक होता है। सब रोगों का समन्वय है। जीवन बालपन से यौवन तक गतिमान है। भव्य और मुक्ताकाशी मंच है। कला की तमाम खूबसूरती अपने उद्दाम आवेग मे है। ऊपर से उमड़ते जन समूह का भावोद्रेक नाटक को परिपूूर्णता की ओर ले चलता है। यहां के आयोजन में बस्तीसराईपाली को गोकुल या नन्दपुुर, सराईपाली कस्बे को राजधानी मथुरा, मिनी स्टेडियम को मंच और राजसिंहासन, बस्ती जलाशय को बड़़ा कालिंदी हृद और यमुना बनाया जाकर पूरा नाटक खेला गया। इसकी अनोखी और अद्वितीय विशेषता यही है कि इस नाटक से हर व्यक्ति चाहते या न चाहते हुए जुड़ा हुआ था और स्वंय को एक सक्रिय पात्र समझता था दर्शक तो था ही। पौराणिकमत के अनुसार वेश भूषा में सुसज्जित महाराज कंस का नगर भ्रमण और जनदर्शन उस दरम्यान संवाद अदायगी। तात्कालिक जन समस्याओं का त्वरित निराकरण, राज दरबार में निर्वाचित प्रतिनिधियों की हाजिरी और जवाब तलब तथा दोषी/दोषियों को तत्क ाल दंड के आदेश का प्रसारण और उसीक्षण परिपालन जैसे दृश्य शानदार बानगी प्रस्तुत करते थे जहां जनता की उत्साही जमावट अपूर्व हुआ करती थी। कृष्ण जन्म, वसुदेव का शिशु को नंद घर में शरणागति, राजा नंद एवं माता यशोदा की गोद मे बालकृष्ण की स्वाभाविक मीठी नटखटें…. माखन चोरी, गोपिकाओं का वस्त्र हरण, गोपालन एवं सेवा, कं स के अत्याचारों का प्रतिकार एवं दमन, अक्रुर के साथ कृष्ण बलराम का गृह त्याग आदि विविध घटनाओं का अंत कंसवध से हुआ जिसकी जनता को निर्निमेष प्रतीक्षा थी और सबने संतोष से गहरी सांस ली एवं हुलहुली व तालियों से जय घोष किया। इस तरह एक महानाटक का सुखद (कामेडी) अंत हुआ। यही सुखद अंत धनुजात्रा का भी समापन था। चूंकि कृष्णायण/कृष्णलीला/कृष्णकथा की सभी घटना बहुश्रुत एवं बहुप्रचलित है जिसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रदर्शनकारी मुक्ताकाशी महानाटक के पूरे मंचन मे जन सैलाब उमड़ पड़ा जिसमें ओडि़य़ा भाषी के अतिरिक्त अन्य भाषी लोग थे यद्यपी नाटक मूलत: ओडि़आ में अभिनीत हुआ लेकिन सबके मन मे गहरा आत्मतोष का भाव छोड़ गया। इस कस्बे में धनुजात्रा शेष हो गयी लेकिन कला प्रेमी (विशेषकर नाटक पे्रमी ) दर्शक जन के हृदय में नयी कोपलें फूट गयी जो नाटक की भूमिगत जड़ से निकली है। स्थानीय स्तर पर यह कार्यक्रम नाटक का पुनरागमन है जहां लोग नाटक से असीम प्रेम करते है। लगता है कि धनुजात्रा के धनुष से मानव मन व उसकी कला संवेदना पर छोड़ी गयी तीरें नये क्षितिज नये वातायन को खोलेगी। संभावनाएं है कि स्थानीय जनमानस में धनुजात्रा से बहुरंगी इन्द्रधनुष का सृजन हुआ है वह परंपरा, धर्म, इतिहास, सहित्य और कला के रचनात्मक क्षेत्र मे मौलिक अवदान देगा। पुस पुन्नी के एवज मे मनोरंजक प्रारूप में ही नहीं वरन नाटक की मौलिक समर्थ व प्रभावकारी अभिव्यक्ति के रूप मे रूपान्तरण होगा और कला की सुप्तवीणा को झंकृत करेगा। जीवन मे स्पंदन आएगा। नाटक के मंच पर से धूल धुसरित यवनिका उठेगी और नाटक की एक जन पक्षधर की भूमिका इलेक्ट्रानिक मीडिया की सडाधंता और सांस्कृतिक विपन्नता को तोड़ेगी। शायद नयी कलात्मक महक फैलाने लगेगी। जो रंगकर्म को नयी संजीवनी भी सिंचेगी एवं स्थानीय कला जगत में एक नया मील पत्थर सिद्ध होगी जहां पहले से मील का पत्थर स्थापित है।

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  • Published: 6 months ago on December 28, 2017
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  • Last Modified: December 28, 2017 @ 5:15 pm
  • Filed Under: Editorial

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