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देशी अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़

By   /   September 8, 2018  /   No Comments

सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा, तोषगांव
यह सर्वज्ञात नीति है कि सफलता के लिए हर पहल सकारात्मक होना चाहिए। प्राय: सबके लिए नीति वाक्य है। साहित्य में किसी भी विधा में लेखन हो तो अधिकतर रचना सकार भावों से शुरू होती है। रस निष्पत्ति के सिद्धांत के आधार पर देखें तो रसराज को प्रथम सकारात्मक भाव की श्रेणी मिल जाती है। रसराज श्रंृगार रस है, परंतु इस आलेख का आरंभ श्रंृगार के विरूद्ध भावविभत्स से करते हैं, जो दृश्य में निहित है, ऐसा दृश्य प्राय: विरल हो गया है नगरों में दुर्लभ और विंगत हो गया है। ग्रामीण अंचल जो विशेषकर जंगल के भीतर या पास में होते हैं वहां यह आजकल भी सामान्य है क्योंकि वहां पालतू और जंगली जानवर अधिसंख्यक पाये जाते हैं। मृत या मरणासन्न जानवर के पिण्ड का मांस नोंच-नोंचकर खाते हुए कौआ, गिद्ध, चील आदि मांसाहारी पक्षी एवं कुत्ता, सियार, भेडिय़ा आदि मांसाहारी जन्तु महाभोज की तृप्ति में आनंद पर्व मनाते हैं साथ ही मत्तंग व उदण्ड नृत्य कल्लोक कर अपना हर्ष व्यक्त करते हैं। निश्चित ही ऐसा दृश्य सह्दय पाठक में घृणा का भाव उद्रेक करेगा ही। क्या आपको नहीं लगता कि कुछ इससे मिलता जुलता रस आजकल की राजनैतिक स्थिति या दृश्य को देखने समझने के बाद आपके मन में नही टपकता? जो भी मानें या कहें इसी प्रकार का रसपान आम आदमी को आम रास्तों सडक़ों और कहीं भी पीना पड़ता है, उसे पीना पचाना और उसकी जद्दोजहद को झेलना नियति हो गई है। आम आदमी विषपायी है जिसके भी नील कंठ हैं। दैनिक जीवन में तमाम दुव्र्यवस्था, चिन्ता, उलझन, दबाव और अनिश्चित: मय के अंधेरे में दम साधे आम आदमी के नाम पर राज्य, संविधान और सरकार बने हैं। स्वतंत्रता समानता मौलिकता जैसे प्रजातांत्रिक सिद्धांत गढ़ दिये गये हैं, लेकिन आम आदमी उक्त दृश्य के केन्द्र में है जिसके मानसिक व शारीरिक नोंच खरोंच और लूटपाट से सत्ता का महाभोज आयोजित होता है, चुनाव इसका विस्तृत परंतु महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। राजनीति का सकारात्मक पहलू जबकि मानवीय करूणा व दुख है, करूणा आधार है तो दुख से परित्राण उसका लक्ष्य है, लेकिन राजनीति में गंगा उल्टी ही बहाई जाती है। इस जमीनी यथार्थ को मानने में किसी को तनिक सी हिचक नहीं है कि राजनीति का प्रारूप मानवरोधी है तथा उसका स्वभाव अपराध हो चुका है। यह जमीनी सच्चाई हर सरकारी छोटे-बड़े काम में हर ओर दिखाई देती है और आम जनता को सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यापक भ्रष्टाचार के विरूद्ध क्यों लोगों को चुप रहना पड़ता है? क्यों जनता में अपने अधिकार, सम्मान और देश के लिए जागरण पैदा नही होता? वह मूक दर्शक बनकर असहमति और प्रतिरोध दर्ज नहीं कर पाती। ऐसे लोग अभी करोड़ों की संख्या में दूर दराज गांवों पहाड़ों मरू स्थलों में निवास करते हैं जहां कथित विकास की शिक्षा, सडक़, बिजली, दवाई, स्वच्छ पानी और पौष्टिक भोजन जैसे आजीविका की अनिवार्य सामग्रियां पहुंच नहीं पायी है, जिनमें से अधिकांश राजनीति, शासन प्रणाली, शासकीय कार्य प्रणाली और शासन की संस्कृति से रूबरू होकर इतने कटुतम अनुभवों से गुजरते हैं कि उनके मन में निराशा, वितरागता और छलना का दंश मिलता है, वे खाली हाथों से मलाल को मलते हुए रहते हैं। इस एक नई प्रवृत्ति जो सत्ताधारियों के चरित्र का अंश है वह विकृति के रूप में प्रदर्शन प्रिय हो गई है। वह विकृति है जन संताप का उत्सव जो प्रजातंत्र, संविधान, स्वतंत्रता, न्याय जैसे बड़े मूल्यों के पतन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। जनता जितनी घोर त्रासदी में फंसती और धंसती जाती है त्यों-त्यों देश का सुविधाभोगी उपभोक्ता व शक्तिशाली एक अल्पसंख्यक वर्ग है जो जनहितकारी राज्य के नाम से महाभोज का आनंद पर्व मनाने की तैयारी कर लेता है, यही प्रभुत्वशाली नीति नियंता वर्ग है जो अल्पसंख्यक होते हुए बहुसंख्यक पर सवार है जिनके पास देश की सबसे बड़ी सत्ता, सबसे ज्यादा सम्पत्ति और सबसे बड़ी अहम्मन्यता होती है। वह शासक वर्ग का एक जरूरी हिस्सा है जो बहुजन या जन गण मन का भाग्य विधाता है। जनसंताप की जो घटनाऐं अकाल, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, भूकंप, बाढ़, तूफान जैसी प्राकृतिक घटनाऐं हों अथवा भूखमरी, महामारी, दंगे, दुर्घटनाऐं जैसी मानव निर्मित घटनाऐं हों, उनकी बारम्बारता की दुहाई देता हुआ यह वर्ग ताक में बैठा रहता है और आनंद पर्व मनाता है जैसे कि जंगल राज में मनाया जाता है जिसका संकेत आलेख की शुरूआत में दिया गया है। इस स्थिति को प्रजातंत्र का कोढ़ कहें अथवा जनता की गहन हताशा की जिसकी सडऩ पर पिछले 70 वर्षों से बड़े विराट वर्तुलाकार वितान सा फफूंद फूट गये हैं जिसकी सुरक्षित छाया में पैशाचिक ताण्डव होता है। इसे भारत में आरोपित प्रजातंत्र को स्थानीय जनता की नकार से उत्पन्न विकार का लक्षण मानें अथवा नवोदित प्रभु वर्ग की अराजक ऐय्याशी का अमानुषिक प्रदर्शन मानेें, परिणाम तो स्पष्ट है कि भारत की मूल अस्मिता के चीरहरण का खेल जारी रहता है। वस्तुत: जनसंताप का आनंद कदापि भारतीय शब्दावली नहीं हो सकता, वास्तव में आयातित और संक्रमित है जो देश में प्रजातंत्र की धीमी स्वीकृति और तदनुरूप जनता की जीवन शैली में ढालने की शांत प्रक्रिया को अंत कर देगी। इस भविष्य वाणी के ठोस आधार है, बिलकुल चिकित्सा विज्ञान की भांति जहां सही लक्षण देखकर निदान और उपचार किया जाता है, चुनाव पूर्व ही उपरोक्त लक्षण स्पष्टत: उभरते हैं जो किसी बड़े रोग की उपस्थिति होते हैं। यह है देशी अर्थव्यवस्था और राजकोष के साथ खिलवाड़, खिलवाड़ करने वाली कोई और नहीं पदस्थ निर्वाचित सरकार होती है जो जनहित की आड़ में खेलती है। लगते जरूर जनहितैषी है तात्कालीक लाभकारी होते हैं परंतु दीर्घकालीन परिपे्रक्ष्य में एक बड़े शोषण (घोटाला)की लोक भावन पूर्व पीठिका बन जाते हैं। घोटालों का समुच्चय आर्थिक दृष्टि से जनता की कंगाली का द्योतन करते हैं। स्वतंत्र देश के इतिहास में कई प्रमाण है कि सरकारों ने चुनाव में जीत पक्की करने के लिए सुनियोजित तरीके से राजकोष का अपव्यय किया है, यह कार्य हर सरकार चुनाव के पूर्व करती है जो चुनाव आयोग के द्वारा ज्ञापित आचार संहिता के प्रभावी होने के पूर्व भी होता है। सरकारें वैधानिक संकट से बचने के लिए ऐसा करती आ रही है, यह कितना सही है? इसका सहज ज्ञान से उत्तर पाने के लिए सरकारी और सरकार के द्वारा अधिशासिन वित्तीय संस्थानों और संकायों की आंकड़ेबाजी की पड़ताल नहीं करेंगे। सर्वविदित है कि ब्रिटिश इण्डिया की परम्परागत अर्थव्यवस्था पूरी तरह से 200 वर्षों में तहस नहस, क्षत विक्षत और मृतप्रायकर दी गई थी। फ्री इंडिया को आर्थिक अधोसंरचना उजड़ी हुई प्राप्त हुई थी, बस नयी अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी ऋण की बड़ी भूमिका थी और देश परंपरागत अर्थ तंत्र को स्वावलम्बी बनाने का गुरूतर लक्ष्य था जो आज प्रत्यक्षत: अपूर्ण ही है। ऐसे पृष्ठ भूमि में काम करने वाली सरकारों को प्राथमिकता स्थिर कर कार्य योजना बनाने में अतिरिक्त कौशल सावधानी और दूरदृष्टि की आवश्यकता होती है जो आज तक जनता की कसौटी में किसी भी सरकार के पास विश्वसनीय स्तर पर नहीं आयी है। तब अर्थव्यवस्था/अर्थतंत्र के साथ खिलवाड़ एक ऐसा सार्वजनिक अपराध माना जायेगा जिसकी कोई सजा नहीं है, किंतु खिलवाड़ राष्ट्रीय दीवालियापन की ओर अग्रसर चरण होता है। अभी विश्व में ग्रीस (एक यूरोपीय विकसित देश) और बोलेबिया (एक दक्षिण अमेरिकी अविकसित देश) हमारे सामने साक्षात प्रमाण है जिनने चुनाव जीतने के लिए सरकार के द्वारा शाही खजानों की थैलियां विशिष्ट वर्गों के लिए खोल दिया था जिसमें अल्पसंख्यक पूंजीपति,उद्योगपति, शासक (नेता) नौकरशाह का छोटा परंतु समर्थ प्रभुवर्ग आता है और हश्र क्या हुआ देश ही कंगाल हो गया सरकारें तो जीती पर अर्थतंत्र दीवालिया हो चुका था। ग्रीस उभर रहा है लेकिन बोलेबिया की लूटिया डूब गई। एक उदाहरण पर्याप्त है कि एक सेव खरीदने के लिए जनता को स्थानीय बाजार में 50 लाख बोलेबियाई मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है, इससे बड़ी दुर्गति की कल्पना की जा सकती है? क्या हमारा देश उस ओर तो कदम नही बढ़ा रहा है? प्रश्न डरावना हो सकता है जिसे नकारा नहीं जा सकता। चूंकि यह चुनावी मुद्दा हो सकता है मतदाता का ध्यान जाना चाहिए। जनमत में अकूत संवैधानिक बल निहीत है जो राजनीति की तूफानी धारा की दिशा मोड़ सकता है कि राजकोष का पूरा सदुपयोग जनहित में ही, किसी विशिष्ट वर्गहित में इसकी फूटी कौड़ी जाया नही किया जाये। इसके लिए जनहित की प्राथमिकता भी जनता तय करे। मसलन एक अति सामान्य बात है कि एक बच्चे की भूख मिटाने के लिए मां को पहले क्या खरीदना चाहिए दूध या झुनझुना (मोबाईल)? प्राथमिकता में भूख पहले है या मनोरंजन? यह भी निश्चित है कि आधुनिक वैश्विक राजनीति में बाजार के द्वारा दबाव के कारण प्राथमिकताऐं बदल दी जा रही है जिसकी रौ में देशी कुलीन वर्ग बह जाता है जो प्रभु वर्ग भी है। लेकिन जनता को ऐसे द्वन्द में नहीं पडऩा है, उसे सार्वजनिक अर्थतंत्र के बहाव, आवक जावक पर गहरी दृष्टि गड़ाए रखना होगा। अपव्यय पर बड़ा चेक वाल्व बनना होगा, क्योंकि जनता की दृष्टि में मां को बच्चे की भूख मिटाने के लिए सर्वप्रथम दूध ही खरीदना होगा। जनता यह भी भली भांति जानती है कि मां ऐसा ही करती है। हर युग की हर मां हर देश की हर मां पहले भी ऐसा करती थी, आज भी करती है, कल भी करेगी। मतदाता को चुनावी संदर्भ में ऐसा ही स्पष्ट होना होगा। सबको याद होगा कि एक लोकप्रिय अभिनेत्री ने प्रांतीय मुख्यमंत्री रहते चुनाव के पूर्व गरीब मतदाताओं को करोड़ों अरबों रूपयों का टीव्ही सेट मुफ्त में वितरित किया था जब टीव्ही आजकल की भांति सामान्य उपहार नही था। वह चुनाव जीती और मुख्यमंत्री भी बनी, लेकिन इतिहास साक्षी है उस लोक लुभावन अपव्यय से प्रांत को जरासा लाभ नही हुआ। राज्य आज भी वैसा ही है आज भी उसके किसान खेतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष करने के लिए विवश हैं लेकिन वंचित ही है। इससे सीख मिलती है कि मतदाताओं को अपनी स्कारात्मक पहल तय करने के लिए दिग्भ्रमित नही होना है जैसा कि एक मां अपने बच्चे की भूख के लिए दूध खरीदने की प्राथमिकता में अडिग हुआ करती है।

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  • Published: 3 months ago on September 8, 2018
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  • Last Modified: September 8, 2018 @ 3:03 pm
  • Filed Under: Editorial

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