Loading...
You are here:  Home  >  Editorial  >  Current Article

छेरछेरा गीत मे अरसा का मिठास और क्रांति के बीज

By   /   January 12, 2018  /   No Comments

कृषि सभ्यता के जन पर्वो को कृषि जन्य मनोपर्व कहें तो भी ज्यादा सहज व लोक लुभावन लगते है। अधिकांश पर्वाे की पृष्ठ भूमि मे कोई न कोई धार्मिक आख्यान जुड़ा रहता है लेकिन इस अंचल मे प्रचलित कृषि उत्सव का आरंभ धान के प्रथम परिपाक से लेकर उसकी पूरी फसल का किसान की घरेलू कोठियों तक के संग्रहण (परिग्रह) मे एक सहजान सिलसिला मिलता है। जिसे नवाखाई से पुस पून्नी तक उत्क्रम विकास व विस्तार में हरे धान को सुनहरे रंग मे जीवनदायी होते देखते पाते छूते भरते तौलते और स्वप्नों व सरोकारों को संजोए पाते है तो असीम आनंद की एक ऋतुमयी यात्रा पुरी हो जाती है। खेती की छोटी बड़ी सरल कठिन, हानिकारी लाभकारी सतत क्रियाओं को श्रम से तृप्ति तक करने वाला किसान अनादिकाल से इसकी धुरी है जो आत्ममुग्ध आत्मतुष्ट और प्राकृतिक प्राणी होता है और श्रम की ही जयकार करता है। इसे ही शायद महाकवि महर्षि वेदव्यास ने श्रीकृष्ण के मुख से गीता में निष्काम कर्म योग कहलवाया है। वैसे महाभारत महाकाव्य में सर्वाधिक चर्चा महायुद्ध की हुई है तथापि कृषि की चर्चा अप्रधान भले ही हो लेकिन काव्य चिंतन की नाभि है। इस तरह भारत देश की तात्विक सर्जना में कृषि और कृषक मुख्य कारक है जिनकी अविच्छिन्न परपंराओं के रूपकारों में आज भी खास उपस्थिति है। दक्षिण कोसल(छत्तीसगढ़ और पश्चिमी ओडि़सा) मे प्रचलित त्यौहारों-नवाखाई और छेरछेरा को इसी संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। इसलिए कई पाठक इसका शीर्षक पढक़र चौंक सकते हैंं कि छेरछेरा गीत में अरसा का मिठास तो है परन्तु क्रांति के बीज कहां हैं, यद्यपि शत प्रतिशत निश्विंतता के साथ कोई सूत्र पकड़ाया नही जा सकता लेकिन स्वतंत्रता के पूर्व 90 वर्षों तथा ततपश्चात आज तक के 70 वर्षों याने कुल 150-160 वर्षों के संक्षिप्त इतिहास में इस संभावना तक निश्चित पहुंचा जा सकता है। ऐसा यकीनन कहने के पीछे कई स्पष्ट घटनाओं की सच्चाईयां हैं। गत लगभग डेढ़ सौ वर्षों की अंतर्धारा की ओर ध्यान जाना चाहिए जब देश की परतंत्र व स्वतंत्र प्रवृतियों का संधिकाल था। सन 1857 में स्वतंत्रता का संकल्प आरंभ हुआ जो तात्कालिक दृष्टि से असफल हुआ माना गया लेकिन मात्र 90 वर्षों के सतत जना आंदोलनों के राजनैतिक परिणाम के रूप में सन 1947 को स्वंतत्रता मिल गई जिसका 70 वर्षों का वर्तमान कालीन विकास भी देखा जा चुका है। संविधान नामक महाग्रंथ कई शीर्षस्थ विद्वानों के द्वारा गहन चिंतन मनन व लेखन के उपरांत अथक परिश्रम का परिणाम जरूर है उसमें प्रजातंत्र, संघ शासन प्रणाली, समता समानता, नागरिक के मूल अधिकार व कर्तव्य बोध आदि कई आदर्शवादी उद्श्यों व मूल्यों का समावेश है जो महान आकार प्रकार में महान संविधान होने के बावजूद मूल भारतीय आत्मा को झंझोरता नही है इसलिए उसे राष्ट्रव्यापी क्रियान्वन करते समय उसकी सीमितता पकड़ में आ जाती है और ऐसी कई घटनाएं स्वाधीन देश के व्यावहारिक धरातल पर घटी हैं जो उसकी सफलता के सामने अबूझ प्रश्र चिन्ह है। दो तीन घटनाओं का उल्लेख पर्याप्त है जयप्रकाश आंदोलन जिसके अनुवर्तन में आपातकाल जैसा खतरनाक हादसा हुआ, अन्ना हजारे का आंदोलन जिसके प्रतिफलन में आम आदमी पार्टी जैसा नया राजनैतिक चेहरा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में उभरा और सत्तासीन हुआ। इन बड़ी घटनाओं के अद्वितीय दृष्टांत होने के बावजूद देश में व्यापक परितर्वन की कोई बड़ी लहर नही उठी। विकास के नाम पर देश के चुनीेंदे लोगों क्षेत्रों एवं आसपास का तीव्रगति से आधुनिकरण की आड़ में पश्चिमीकरण एवं तकनीकी उन्नयन हुआ। ऐसे तथाकथित विकसित लोग 5 प्रतिशत से अधिक नही होंगे जो एकाएक अदभुत गति से समृद्ध, शक्ति संपन्न, अहमन्य और सुविधा भोगी हो गए और इस तरह स्वयं समूह को बहुमत से बहुत ऊपर उठा ले गए। वह भी अंग्रेजी भाषा और संस्कृति से अनुशासित जीवन शैली के दायरे में वे तन के गोरे अंग्रेज बन गए। भारतीय शरीर में अंग्रेजी दिमाग बस गए। उनमे शेष भारत की तुलना में इतना आगे बढक़र अपने चहुंओर अहम का दुमेध आवरण बना लिया कि इनकी मनोभूमि में दास प्रथा का स्वामी अवतीर्ण हो चुका है। साफ साफ कहें तो देश के 5 प्रतिशत नागरिक प्रभु स्वामी मालिक हो गए और शेष 95 प्रतिशत अनुचर भृत्य दास गुलाम की कोटि में आ गए। दो वर्गों के बीच अमानुषिक संबंध हो गया। यह सर्वथा नया मनोविकार स्वंतत्र भारत की नई स्थापना है। पूर्ववर्ती घातक जाति प्रथा से भी बढक़र है। इतना ही नही थोड़ा इतिहास के पृष्ठों को पलटें तो पाएंगे कि प्राकस्वातंत्रय गांधीवाद से उज्र्वस्वित ज्योति भी भारत के प्रात:काल को धुंध में ढांक दी गई तब राष्ट्र का दुर्भाग्य देखिए कि ऐसी अमर ज्योति भी भारत के अदृश्य व अस्पृश्य बना दी गई। ऐसी कई तात्कालीन घटनाओं ने पूरे देश की रीढ़ को तोडक़र रख दिया कि मुक्ति के कौन सूत्रधार खोजना भी धुंधला पड़ गया। स्वतंत्रता एक स्थितिज भाव है जो प्रजातंत्र एक मूल्य जनित पद्धति है जो स्वयं में मुक्ति नही है लेकिन वर्णित इतिहास के डेढ़ सौ वर्षों के जन जीवन से यह स्पष्ट निष्पत्ति ध्वनित होती है कि देश की मुक्ति कामना अलभ्य, अलक्ष्य अथवा अनार्जित नही है। राजनैतिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियां भी यहीं प्रतिपादित करती हैं। तब मुक्ति कामना का बीजांकुर कहा है? कौन मुक्तिदाता है? कोई व्यक्ति या समूह्? या कोई उत्पाती, हड़ताली, लालची, अथवा प्रंपची समुदाय है जो मुक्ति रेखा खीचेंगी? क्या राजनैतिक गोरखधंधे के जो स्वंयभू नेता हुंकार भर रहे हैं वह महज बकवास नही? क्या गांधी युग में उनसे पहले या बाद में कोई सूत्र हस्तगत नही हुआ? प्रश्रों की खोज में कोई महीन सूत्र जरूर है इन 150-160 वर्षों में एक अटूट अंर्तधारा मिलती है कि देश का भाग्य विधाता और मुक्तिदाता एकमात्र अन्नदाता किसान है, अन्य कोई नही। एकमात्र विकल्प बचा है कि देश में परिवर्तन कहिए, क्रांति कहिए या मुक्ति मानिए… उसका एकमात्र संवाहक किसान है बाकी सबको समय ने फेल व फालतू साबित कर दिया है एक प्रकार से खारिजशुदा है। बस किसान ही देशभर में उसके चप्पे चप्पे में निवास करता है। उसकी व्यापकता, निरंतरता, और क्रमिकता उसे देश का पर्याय मानती है। इतना पुरातन सजीव है किसान कि भारतभूमि के हर किस्म के प्राकृतिक भौगोलिक सामाजिक राजनैतिक और धार्मिक नृतत्व वृत में घटित विलप्तों के बीच से सिद्ध विजयी और पुनरूदित रहता आया है। अतएव किसान की क्रांतिधर्मिता और क्रंातिकारिता पूरी वैश्विक सभ्यताओं मे अनोखी अतुलनीय और मौलिक गुण है। इस जीवन गुण को साम्यवादी विचारधारा से प्रसुत आधुनिक कसौटी से परिभाषित और चिन्हित नही किया जा सकता। हां इसमें वीरनारायण की संपूर्ण क्रांति , अन्ना हजारे का संस्कार क्रंाति और बहुविध भारतीय क्रांतियों का विलयन है जिसमें अनेक मूल्य संवाहित होते हैं जिस संवहन मे कोई उदग्रता व उदण्डता नही है वरन अर्तग्रथित शांतता है जिसे भारतीय मनुष्य(किसान) एवं प्रकृति के अंतरावलम्बन की सामयिक व्याख्या करते हुए सुंदरलाल बहुगुणा, अनुपम मिश्र, राजेन्द्र सिंह, मेधा पाटकर आदि कई पर्यावरण विदों ने घटना प्रधान सक्रीयता दिखाई है। किसान को ही केन्द्र माना गया है और अनेक गांधीवादी चिंतकों, प्रतिष्ठानों, अनुयायियों ने लगातार जन मानस का ध्यान खींचा है। इसमें नदी घाटी योजनाओं से पीडि़त विस्थापित किसान, वनवासी, आदिवासी समूहों के लिए आंदोलन सम्मिलित है। सबके समग्र प्रयासों से वह अन्र्तधारा अभी भी जीवित हैं। इसलिए कहा गया है कि किसानों पर्वों में मिठास और क्रांति दोनो सूक्ष्म रूप से उपस्थित है। पुस पुन्नी में गाए जाते गीत का उदाहरण ले लें। यह गीत घर घर गली गली में गंंूजता है। गीत में महस महाप्राण को किसी विशिष्ट महाकवि ने नही भरा है। यह शुद्ध समूह गीत है जिसकी रचना कृषि समूहों ने की है। गीत की पहली कड़ी एक मधुर उदबोधन है आप जानते हैं छेरछेरा..छेरिछेरा मरकनिन छेरछेरा..माई कोठी के धान ल हेरहेरा यह छत्तीसगढ़ी या लरिया बोली मे भिक्षा गीत है जो बच्चों के शोख चंचल और मधुर आवाज में द्वार द्वार गाया जाता है जिसकी गूंज अनुगुंज कई दिनों तक चलती रहती है। कई वयस्क पार्टियां, इसकी सांगातिक भ्रमण गीत प्रस्तुति देती है। गीत सादर निवेदन है क्या इस अनुनय विनय में करूणा छिपी नही है? क्या इस करूणा के पीछे जनता का कोई विवश दुख मौन रोदन नही कर रहा है? छेरछेरा क्या अकाल या दुर्भिक्ष की दुर्दांत पीड़ा को झेलने का एक मानवीय प्रयास नही है जिसकी परंपरागत छवि आज भी जीवित है। क्या अकाल के दंश और पीडऩ को मिल बाटकर भोगने का एक छोटा गुनगुनाया होगा जिसने उसके युवाकाल में कोठियों में जमा धान को खुलवाकर भूखी जनता मे वितरित करने के क्रांतिकारी कदम उठाने की प्रेरणा दी थी? क्या वीर जमींदार ने राजधर्म निभाते हुए क्रांति का बीजोरोपण नही कर दिया था? छत्तीसगढ़ का इतिहास साक्षी है कि महानदी के तट पर स्थित सोनाखान में फूटी क्रांति की चिंगारी पूरे वनप्रांत में दावानल बन गई। जनसेवा के लिए कृतकार्य ने नारायण सिंह को वीर पुरूष बना दिया। किसान उस वीर के पीछे कूद पड़े और शोषण(प्रकारांतर में गुलामी) के खिलाफ बगावत की रणभेरी फूंक दी। संभवत: 1857 के आसपास की यह घटना है। बालक में क्र ांति की अदम्य प्रेरणा छेरछेरा ने भरी थी। मां को याचना का गीत कभी अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष का शंख बन गया। यह गीत का विरोधाभासी पहलु है। जिसमें क्रांति बीज समय की मांग पर स्वमेव आ गए। छेरछेरा में केवल मिठास भर नही है उसमें चावल, गुड़ और तेल से बने अरसा का जीवनरस है भी है परन्तु इतिहास में शब्दगीतों ने क्या क्या अर्थ जनता में जागृत किया है उसका अनुपम नमूना छेरछेरा गीत है
सुरेन्द्र प्रबुद्ध अक्षरा, तोषगांव।
(यह लेखक के अपने मूल विचार है)।
——————————-

    Print       Email
  • Published: 4 days ago on January 12, 2018
  • By:
  • Last Modified: January 12, 2018 @ 4:13 pm
  • Filed Under: Editorial

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

You might also like...

अशिष्ट पाक से कोई भी उम्मीद महज छलावा

Read More →

Hit Counter provided by Skylight