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काँदा कस उसनात हे

By   /   May 30, 2018  /   No Comments

कभू घाम कभू पानी, भुँइया हा दंदियात हे ।
जेठ के महिना में आदमी, काँदा कस उसनात हे।
दिनमान घाम के मारे, मुँहू कान ललियावत हे ।
पटकू बाँध के रेंगत हे, देंहे हा पसिनयावत हे।
माटी के घर ला उजार के, लेंटर ला बनात हे ।
जेठ के महिना में आदमी, काँदा कस उसनात हे।
कूलर पंखा चलत तभो ले, पसीना हा आवत हे ।
लाइन हा गोल होगे ताहन, भारी दंदियावत हे ।
दिन में चैन न रात में चैन, मच्छर घलो भुनभुनात हे।
जेठ के महिना में आदमी, काँदा कस उसनात हे।
खाय पीये के सुहात नइहे, पानी भर पीयावत हे ।
अम्मटहा साग में थोकिन , भात हा लीलावत हे।
लीमऊ ला डार के माटी, सरबत ला बनवात हे ।
जेठ के महिना में आदमी, काँदा कस उसनात हे ।
रुख राई तो कटा गेहे, अब छाँव ला खोजत हे ।
आगी लगगे गाँव में तब, कुवाँ बर सोचत हे ।
चुगगे सबो दाना ला तब, पाछू बर पछतात हे ।
जेठ के महिना में आदमी, काँदा कस उसनात हे।
महेन्द्र देवांगन माटी
पंडरिया कवर्धा छत्तीसगढ़
मो. 8602407353

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  • Published: 5 months ago on May 30, 2018
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  • Last Modified: May 30, 2018 @ 7:20 pm
  • Filed Under: Poetry

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