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कल युग

By   /   September 26, 2018  /   No Comments

 

अवधेश अग्रवाल
संसारी मनुष्य पाप से वंचित नही है। हर मनुष्य पाप करता है, करता रहेगा और करेगा, चाहे सतयुग हो कलियुग हो बल्कि सतयुग में पाप इतना अधिक हो गया था कि उसे कम करने या नाश करने के लिए स्वयं भगवान को अवतार लेना पड़ा था।
भगवान एक ऐसी अदृश्य शक्ति जिसे हम बिना देखे ही स्वीकार करते हैं। हमको स्वीकार करने में हीचक भी नही होती, होनी भी नही चाहिए, क्योंकि आज संसार में हम अपने आस्तित्व को किसी अदृश्य शक्ति से बंधे पाते हैं। हम चाह कर भी शक्ति पर अविश्वास नही कर सकते क्योंकि वह ऐसी शक्ति जिससे हम ही नही बल्कि संसार उसके निर्देशन पर चलता है। अदृश्य शक्ति सहारे हमारा आस्तित्व हैं, उसे भगवान कहते हैं। पाप जब भी संसार में अधिक होता हैं तभी भगवान अवतार लेते हैें। हम कहते कलयुग में पाप बढ़ गया तो फिर पाप नाश करने वाले भगवान का जन्म क्यों नही हो रहा है? यानी कलयुग में इतना पाप नही हुआ जितना सतयुग में ? क्योंकि कलयुग में भगवान ने जन्म नही लिया है।
सतयुग का सत्य का युग कहा जाता है, लेकिन कलयुग में हम कल का युग तो कह देते हैं मगर कल कौन सा कल क्योंकि कल का अर्थ मसीन भी होता हैं। एक प्रकार से हम इस बात से सहमत हैं कि यह मसीनों का युग है मनुष्य बहुत कुछ मसीनों पर निर्भर है। मनुष्य की हर क्रिया में कही न कहीं कुुछ न कुछ अंश में मसीन का प्रयोग अवश्य रहता है। कल का दूसरा अर्थ होता है सुंदर यानी सुंदरता का युग यह बात भी इस युग के लागू होती हैं। आज का मनुष्य सुंदरता के पीछे ही अपनी ताक तथा आंख लगाए रहता हैं फिर अभी प्राकृति का ही नियम हैं कि सुंदरता से हर कोई को लगाव होता हैं। मानव का लगाव होना भी स्वाभिवक है। सुंदरता के लिए इस युग मे कई लोग बने और बिगड़े हैं।
तीसरे कल का अर्थ होता हैं दूसरे दिन यह भी इस युग में पूर्ण रूप से लागू है, मनुष्य को तुरंत काम करने में आलस आने लगा हैं। थोड़ी देर में कर लेंगे या फिर बाद में कर लेेंगे। ये आज कल मनुष्य की प्रवृत्ति हो गई है कि आज करे सो कल कर इस तरह मनुष्य कभी समय से आगे नही जाना चाहता है बल्कि वह समय के पीछे जाना चाहता है जबकि उसे यह भी मालूम है कि समय किसी का इंतजार नही करता है।
ऐसा लगता है जैसे कल शब्द का ही युग आ गया जीवन के हर क्षेत्र में कल आ गया सुंदर जीवन मसीनों द्वारा कल तक के लिए। लेकिन कल में सिर्फ सुंदर ही निहित नही है जब यह कल कल हो जाता है तो यह युग हवा का युग हो जाता है। मनुष्य की जिंदगी में कहीं शांति नही है।
पापी कौन
मनुष्य के ह्दय के एक भाग में पाप होता ही है और धीरे धीरे उसका विकास होते जा रहा हैं। पाप सिर्फ मनुष्य करता है ऐसी बात नही बल्कि भगवान भी करते है। कृष्ण को हम भगवान का अवतार मानते है उन्होने झूठ कहा और झूठ बोलना पाप है ऐसा हम कहते है। जब तक हमारे मन में कोई बात नही होगी तब तक हम किसी बात को कैसे कह लिख या बना सकते हैें, जब हमारे ह्दय में पाप नही होगा तो हम पाप का कार्य क्यों करेंगे। कहने वाले कहते है भगवान भी पापी हैं क्योंकि उसके मन में पाप था तभी तो इस पाप मय संसार की रचना की। पाप भरा कार्य करने का साधन बनाना, एक पापी ही कर सकता है।
मनुष्य व्यक्ति पूजा चाहता है, मनुष्य ने चाह लिया तो उसका विरोध होगा और षणयंत्र रचेंगे और उस व्यक्ति को मिटाने की चेष्टा करेंगे। अरे उसको हटाने के पहले हमें भगवान को हटाना चाहिए। वह भी तो खुद की पूजा और अर्चना चाहता है, व्यक्ति बिना डर के कुछ नहीं करता डरा थका व्यक्ति ही ईश्वर की शरण में जाता है। ईश्वर प्रसन्न होकर वरदान देगा, एक ने पूजा की तो उसका दूख दूर कर दिया और एक ने पूजा नही की तो उसका दुख बढ़ा दिया। यह कहां का न्याय हैं
आज जब कोई हमें इतने साधन जीवन के लिए उपलब्ध करता है तो हम मन ही मन उसे बहुत मानते है। मानलो उसकी ब सुविधा देने केे बाद भी हम उसे गाली दे या दुव्र्यवहार करे तो वह क्रुद्ध हो जाएगा और हमें यातना के रास्ते में पहुंचा सकता है।
किसी भी तन मन की पूजा से कोई खुश होकर हमारे कितनी भी तकलीफ क्यों न हो कई बार सिर्फ अपने भक्तों के सुख के ध्यान को रखतें हुए उन्हे मनुष्य बनना पड़ा है और कई तकलीफें सही है।
यह भी हमारा कर्तव्य है कि अगर किसी का नमक खाते हैं तो हमेंं उसके प्रति वफ ादार होना चाहिए अगर हम अपने कर्तव्य के प्रति वफादार हैं तो वह हमें कभी नर्क नही भेजेगा। हम सोचते या प्राय: करते हैं। दिनभर पाप करते रहे और रात में जाकर पुजा कर लो तो क्या हमारा पाप नष्ट हो जाएगा। हमें इससे क्या करना कि वह किसी को सुख या दुख देता है, हम उसके प्रति वफादार रहे तब वह हमसे न्याय जरूर करेगा।
हमें अपने अस्तित्व निर्माता पर गर्व करना चाहिए जो उसके ध्यान से स्मरण करने से हमारे सुख का ख्याल रखता है। हमें अपने अस्तित्व निर्माता के प्रति जो कर्तव्य है उसको पूर्ण करना चाहिए।
यह बात आज सर्वमान्य है कि बेटे जब पैदा होते हैं, साथ-साथ खेलते हैं और बड़े होते हैं तब तक माँ बाप का प्यार समान रहेगा और जब उनमें से एक अपनी कमाई में माँ बाप का पोषण करें तब वह उनको अधिक प्यारा होगा, ये संसार का नियम है और इस नियम को बनाने वाला इस नियम से कैसे वंचित रह सकता है।

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  • Published: 3 months ago on September 26, 2018
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  • Last Modified: September 26, 2018 @ 4:02 pm
  • Filed Under: Editorial

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