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कर नाटक देख नाटक – महानाटक

By   /   May 30, 2018  /   No Comments

सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा- तोषगांव

देश का सारा वायुमंडल नवतपा के उत्पातों से खलबला रहा है। पूरा प्राणी जगत सन्नाटे मे हैं, विश्व का सर्वाधिक दैनिक उच्च तापमान यहीं राजस्थानी शहर का है। गरम लू और शर्दियों से गरजता झंझावात लगभग आधे देश को चपेट में लेकर हलाकान कर रहा है जबकि हिमालय की गोद में ब्रह्म पुत्र की घाटियों वाले छोटे राज्यों में मूसलाधार वर्षा से जल प्लावन की भीषण स्थिति बनी हुई है। गर्मी औसत से इतना अधिक बढ़ गयी है कि प्राणियों का समतापीय संतुलन बिगड़ रहा है। अधिकांश राज्यों में आम जनता के लिए पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। छोटी और मंझली वनस्पतियों एवं पेड़ पौधों को भू-जल का स्तर निरंतर गिरते जाने से जीवन के लाले पड़ रहे हैं, उन्हे प्यास बुझाने के लिए एक बूंद पानी के लिए तरस जाना पड़ रहा है। जंगलों में भडक़ा हुआ अनल खेत खलिहानों में फैलकर दावानल का प्रचंड रूप धारण कर रहा है कि जंगली जानवर प्राणातुर होकर जन पर्यावास की ओर अतिक्रमण कर रहे हैं और अप्रत्याशित जीवन संघर्ष छिड़ गया है। छत्तीसगढ़ में इन गर्मियों में हाथी एक दुसाध्य संकट बन गये हैं। ग्रीष्म ऋतु वर्ष प्रति वर्ष क्रमश: अधिक क्रूर और भयावह बन रही है। प्रकृति के रौद्र रूप की मात्र झलकियां दिख रही है, ये बाहरी पर्यावरण और पर्यावास के साथ-साथ शारीरिक संरचना में अनोखे परिवर्तन हो रहे हैं जो प्राकृतिक असंतुलन के कारण हैं। इस प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन मानवीय चेतना में गंभीर द्वन्द्वात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, इसलिए सामाजिक जीवन में बड़े ऊथल-पुथल हो रहे हैं या होने वाले हैं जिसकी पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। राजनैतिक क्षेत्र इसका ज्वलंत कुरूक्षेत्र बनता है। हाल में संपन्न कर्नाटक के प्रांतीय चुनाव से ऐसे बखेड़े का विस्फोट आशंकित हो रहा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ सकती थी, वहीं जो कुछ घट रहा था वैसे भारतीय जनता नहीं चाहती थी यहां तक की कर्नाटक के मतदाता नहीं चाहते थे। मगर लोकतंत्र की विविधता पूर्ण परिसीमा में गणित के सामान्य सूत्र तो सामान्यत: आजमाये जाते हैं, घट बढ़ गुणा भाग जैसे सांख्यिकीय आकलन सरकार बनाने के दरम्यान तो चलते रहते हैं जो देशी राजनीति के जैसे अनिवार्य चारित्रिक हिस्से हो गये हैं लेकिन एक मर्यादा में ही उचित संदर्भों के साथ संभव और मान्य हैं। मर्यादा टूटी कि सीता चोरी हुई और एक संभावित महायुद्ध की पटकथा पूरी हुई फलत: राम और रावण युद्ध की अपरिहार्यता से सन्नद्ध होकर अग्रसर हो जायेंगे, दरअसल राजनैतिक नेतृत्व के घनघोर पतन ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं को इतना खोखल कर रखा है जो संविधान से ही बाहर निकलकर जब कभी और जहां कहीं अत्यावश्यक हो अपनी भूमिका में तत्परता से उतर जाते और लोकतंत्र की काया को अपाहिज होने से रोक लेते। लेकिन इस पुनीत कार्य को राजनीति से बाहर न्यायालय को कर्नाटक में करना पड़ा, जबकि यह क्षेत्राधिकार राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष (वाचस्पति) और राजनैतिक दलों के त्रयी में समाविष्ट हैं, जैसा होना था वैसा राज्यपाल के द्वारा आधा अधूरा किया जा रहा था और भ्रष्टाचार की बड़ी भारी गुंजाइश छोड़ी जा रही थी। जैसा होना था वैसा अल्पकालीन वाचस्पति की करतूत स्पष्ट और पारदर्शी नहीं लग रही थी। संवैधानिक संस्थाओं पर अंविधानेतर सत्ता का अंकु श और रीमोट संचालन की आशंकाऐं बढ़ रही थी, वहां ठीक समय पर न्यायालय ने न्याय की टेक लगा दी न कांग्रेेस की और न भाजपा की राजनीति बाजी चल पायी। सबको अपने-अपने चेहरे और दायरे बता दिये गये। बिना कहे हुए निष्पक्ष न्यायतंत्र ने सब संबंद्ध पक्षों को कठघरे में खड़ाकर दिया सत्ता, शासन, राजनैतिक दल, विधायक, मुख्यमंत्री, मंत्रिमण्डल, अध्यक्ष आदि सबके तामझाम निष्प्रभ रह गये। न्याय की तराजू पर सब चढ़ा दिये गये और राजनीति का घोर स्खलन थम गया। कर्नाटक चुनाव अचर्चित रह गया और राष्ट्रीय राजनैतिक चेतना या प्रज्ञा की सारी एकाग्रता लोकतंत्र के मूल्यों के संरक्षण और स्थायी स्वस्थता पर टिक गयी। यथार्थत: लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी कारगर और सफल हो सकती है जब संविधान मैदान में अम्पायर की सार्थक और सक्रिय भूमिका में गतिशील रहे अन्यथा संसद को सडक़ बन जाने अर्थात भारत को सीरिया या मध्यपूर्व एशियाई कोई देश में तब्दील हो जाने में कोई ज्यादा देरी नहीं लगेगी। इतनी चर्चा का यह आशय नही कि कर्नाटक का चुनाव पूर्णत: नकारात्मक रहा, उसके कई सकारात्मक पहलू है जो देशी राजनीति के भविष्य के स्पष्ट संकेत हैं। हर चुनाव के राजनैतिक विश£ेषण को अधिक वरीयता व चर्चा मिल जाती है। भाजपा ने अपने निकट अतीत की अर्जित सफलता को सबसे बड़ी विजयी पार्टी बनकर दोहराया है और जन विश्वास या जनमत को सिद्ध किया है, विगत उत्तर प्रदेश से लेकर आग्नेय प्रदेशों तक के सातत्य में जीत के साथ सत्तासीन हुई भाजपा कर्नाटक में अहंकार और अति विश्वास का शिकार हुई जो भूल भारी पड़ी। उसका निर्वाचित मुख्यमंत्री मात्र 55 घण्टे के कार्यकाल के पश्चात त्यागपत्र देने में विवश हुआ। त्यागपत्र विधानसभा के पटल पर बहुमत सिद्ध करने के पहले देना पड़ा और भाजपा को बेकफुट पर आना पड़ा। न्यायालय के स्टेण्ड से संविधाननेतर सत्ता केन्द्र का रीमोट काम नहीं आया, यहां पार्टी गच्चा खा गयी लेकिन नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आयी। गैर कांग्रेसी राजनय के वृत्त में वे एकमात्र नेता हैं जो विशिष्ट परिवार, इतिहास और परंपरा से हटकर सामान्य जन परिवार और वर्ग से आते हैं, जिनने कांगे्रसी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी उत्तराधिकारी पुत्री इंदिरा गांधी (भूतपूर्व प्रधानमंत्री-द्वय-पिता पुत्री) की लोकप्रियता से आगे दिखाई देते हैं। अब उनके विजय रथ को रोकना कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों के लिए एकमात्र राजनैतिक मुद्दा है जिसकी नींव कर्नाटक के चुनाव में पड़ी है। आगामी लोकसभा चुनाव 2019 में प्रस्तावित है, जिसे महाभारत की संज्ञा दी जा रही है, प्रस्तावित आम चुनाव सचमुच महासमर होने जा रहा है, गैर भाजपाई दलों की एकजुटता उनकी विवशता है,तो कर्नाटक में पराजित हुआ सा (शायद घायल भी) गब्बर शेर अपनेे विराट बहुमत के सैन्य बल के साथ कुरूक्षेत्र मे उतरेगा जो हार मानना नहीं जानता और किसी पराजय को पचा नहीं पाता। सबने कर्नाटक में मंचस्थ नाटक को जिज्ञासा से देखा है जबकि आगामी महानाटक सन्निकट है जिसमें कोई तटस्थ दर्शक (पे्रक्षक) नहीं रह पायेगा। सबको अपना पात्र का अभिनय करना होगा अर्थात महानाटक करेंगे, देखेंगे, भोगेंगे और भुगतेंगे भी।

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  • Published: 3 months ago on May 30, 2018
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  • Last Modified: May 30, 2018 @ 7:22 pm
  • Filed Under: Editorial

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