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अज्ञात भय

By   /   July 11, 2018  /   No Comments

अज्ञात भय
क्यों राष्ट्र को थोप रहे हो,
भय अज्ञात,
मेरी मानो, करो न तुम,
उपहास अपना, क्या तुम्हें है ज्ञात।
जीवन के उस पल में,
क्या मिलेगा तुम्हें,
जब तुम कुछ कर न पाओगे,
ज्ञात।
अरे! कुछ तो समझो,
मैं कोई नहीं हूँ अपराधी,
फिर कौन करेगा, उससे शादी,
क्या तुम्हें है ज्ञात।
मानकर जो न माने,
जानकर जो न जाने,
ऐसी क्या पीड़ा है, व्यर्थ,
क्या कुछ है ज्ञात।
जीवन मिला है सबको,
जीने भी दो,
मुझे और भी कुछ लिखने भी दो,
दिन है कि रात।।
गजानंद राय
(सरस्वती पुत्र) सराईपाली

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  • Published: 2 weeks ago on July 11, 2018
  • By:
  • Last Modified: July 11, 2018 @ 9:49 am
  • Filed Under: Poetry

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